ऊर्जा क्षेत्र के निजीकरण पर साज़िश का आरोप!
ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन का बड़ा खुलासा – राष्ट्रीय आंदोलन की तैयारी
नई दिल्ली, 25 सितंबर 2025 – ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF) ने ऊर्जा क्षेत्र के निजीकरण की गुप्त साज़िश का पर्दाफाश करने का दावा किया है। फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने केंद्र सरकार, केंद्रीय विद्युत मंत्रालय, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) और ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोसिएशन पर “मिलीभगत” का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पूरा खेल ऊर्जा क्षेत्र को निजी हाथों में सौंपने की दिशा में है।
दुबे ने एसोसिएशन और ऊर्जा निगमों के बीच हुए पत्राचार को सार्वजनिक करते हुए इसे “देश के ऊर्जा क्षेत्र में हस्तक्षेप की अब तक की सबसे बड़ी साजिश” करार दिया।
बड़ा आरोप
- AIPEF का दावा: ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोसिएशन “समानांतर सचिवालय” चलाकर बिजली निगमों के कार्यों में हस्तक्षेप कर रहा है।
- मुख्य व्यक्ति: एसोसिएशन के डायरेक्टर जनरल आलोक कुमार ने 9 सितंबर को सभी ऊर्जा निगमों को पत्र भेजकर डेटा मांगा।
- फेडरेशन का तर्क: यह काम मंत्रालय और CEA की शह पर किया जा रहा है, मानो एसोसिएशन खुद ऊर्जा मंत्री हो।

घटनाक्रम की पड़ताल
- 08 सितंबर 2025: केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की मीटिंग में डिस्कॉम एसोसिएशन को शामिल कर कॉस्ट रिडक्शन पर सुझाव मांगे गए।
- 09 सितंबर 2025: आलोक कुमार ने सभी ऊर्जा निगमों को पत्र लिखकर डेटा मांगा।
- अप्रैल 2025: डिस्कॉम एसोसिएशन ने केंद्रीय विद्युत मंत्रालय के सामने प्रस्तुति (प्रेजेंटेशन) दी थी।
AIPEF की चेतावनी
- यदि डिस्कॉम एसोसिएशन की दखलंदाजी बंद नहीं हुई और उससे जुड़े निगमों के अध्यक्ष/प्रबंध निदेशक पद पर बने रहे,
- तो 27 लाख बिजली कर्मचारी और इंजीनियर आंदोलन के लिए सड़क पर उतरेंगे।
- फेडरेशन और NCCOEEE (नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लॉइज एंड इंजीनियर्स) केंद्रीय विद्युत मंत्री मनोहर लाल खट्टर से इस मामले को तुरंत उठाएंगे।
विवाद का केंद्र
- महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के ऊर्जा निगमों के अध्यक्ष डिस्कॉम एसोसिएशन के शीर्ष पदों पर बैठे हैं।
- इससे हितों का टकराव (Conflict of Interest) और गहरा हो गया है।
- दुबे का कहना है कि यह संस्था सरकार और निजी घरानों के बीच “बिचौलिये” का काम कर रही है।
विश्लेषणात्मक दृष्टि
यह विवाद केवल बिजली कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा का नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा नीति की दिशा तय करने वाला है।
- क्या ऊर्जा क्षेत्र का निजीकरण वास्तव में “कारगर सुधार” है या फिर यह कॉर्पोरेट हितों की साज़िश?
- डिस्कॉम एसोसिएशन की बढ़ती भूमिका भविष्य में सार्वजनिक बनाम निजी हितों की बड़ी जंग छेड़ सकती है।
- देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी आने वाले समय में बिजली आपूर्ति व्यवस्था को भी प्रभावित कर सकती है।
👉 अब बड़ा सवाल यह है कि केंद्रीय विद्युत मंत्री इस मामले पर क्या रुख अपनाते हैं?
क्या सरकार इन आरोपों को सिरे से नकारेगी या फिर 27 लाख कर्मचारियों के दबाव के चलते नीति पर पुनर्विचार करेगी?











