आभास महासंघ का बड़ा अल्टीमेटम
दलित प्रदेश, बैलेट पेपर से चुनाव और मॉडल स्कूलों की मांग
“सरकारी स्कूलों को बंद करना गरीबों की शिक्षा पर हमला”, महासंघ
राष्ट्रपति को भेजा 6 सूत्री ज्ञापन, चेतावनी– मांगें न मानीं तो राष्ट्रव्यापी आंदोलन
बिजनौर, 19 अगस्त 2025
आभास महासंघ (मिशन 24 कैरेट) और उससे जुड़े कई सामाजिक संगठनों ने मंगलवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को संबोधित एक ज्ञापन जिला प्रशासन को सौंपा। संगठन ने शिक्षा, दलित प्रदेश गठन, ईवीएम पर रोक और लोकतांत्रिक सुधार जैसे मुद्दों पर कड़े कदम उठाने की मांग की है।
शिक्षा पर सबसे बड़ा सवाल
महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट लाल सिंह भूमबोलकर ने कहा कि मध्यप्रदेश, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में प्राइमरी स्कूलों को मर्ज करने के नाम पर बंद करना गरीब, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ है।
उन्होंने मांग की कि –
- गांव-गांव के प्राथमिक विद्यालयों की दशा सुधारी जाए।
- समान शिक्षा और निशुल्क शिक्षा नीति लागू की जाए।
- सभी सरकारी विद्यालयों को मॉडल और अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में बदला जाए।
निजीकरण पर रोक और राष्ट्रीयकरण की मांग
ज्ञापन में स्पष्ट कहा गया कि सरकारी संस्थानों और विभागों के तेजी से हो रहे निजीकरण को रोका जाए।
“निजीकरण गरीबों को शिक्षा और रोजगार से वंचित करने की साजिश है, सरकार को राष्ट्रीयकरण को बढ़ावा देना चाहिए।” – महासंघ
दलित प्रदेश का मुद्दा गरमाया
संगठन ने उत्तर प्रदेश के विभाजन की मांग करते हुए कहा कि “दलित प्रदेश” बनाकर युवाओं को रोजगार और शासन-प्रशासन में न्यायपूर्ण भागीदारी दी जानी चाहिए।
जाति-धर्म के नाम पर अन्याय पर रोक
ज्ञापन में जाति और धर्म के नाम पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ कठोर कदम उठाने की अपील की गई।
ईवीएम बनाम बैलेट पेपर
महासंघ ने कहा कि भारत के लोकतंत्र को सुरक्षित रखने के लिए ईवीएम पर रोक लगाई जाए और चुनाव सिर्फ बैलेट पेपर से कराए जाएं।
सुरक्षा की मांग
एडवोकेट लाल सिंह भूमबोलकर पर दो बार जानलेवा हमले होने का जिक्र करते हुए संगठन ने सरकारी सुरक्षा दिए जाने की मांग भी रखी।
सरकार को चेतावनी
आभास महासंघ ने साफ कहा है कि यदि केंद्र और राज्य सरकारों ने इन मांगों पर सकारात्मक कदम नहीं उठाए, तो बहुत जल्द आंदोलन को राष्ट्रव्यापी स्वरूप दिया जाएगा।
बैकग्राउंड
आभास महासंघ (मिशन 24 कैरेट) कांशीराम बहुजन मूवमेंट से प्रेरित एक सामाजिक संगठन है, जो शिक्षा, सामाजिक न्याय और आर्थिक असमानता के खिलाफ लंबे समय से सक्रिय है।
आगे क्या?
अब निगाहें केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। यदि ज्ञापन पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो बिजनौर से शुरू हुआ यह आंदोलन देशभर में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।











