UP बिजली निजीकरण पर संग्राम: संघर्ष समिति ने दी मौन प्रदर्शन की चेतावनी

लखनऊ | 17 अगस्त 2025। उत्तर प्रदेश में बिजली निजीकरण को लेकर संघर्ष एक नए मोड़ पर पहुँच गया है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने पावर कॉरपोरेशन द्वारा तैयार किए गए निजीकरण आरएफपी डॉक्यूमेंट को “लूट का दस्तावेज़” बताते हुए निरस्त करने की मांग की है। समिति ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो बिजली कर्मचारी नियामक आयोग कार्यालय पर मौन प्रदर्शन करेंगे।
क्या है मामला?
- पावर कॉरपोरेशन ने पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण हेतु RFP (Request For Proposal) भेजा है।
- संघर्ष समिति का दावा है कि इस RFP में 1 लाख करोड़ रुपए की परिसंपत्तियाँ मात्र 6500 करोड़ रुपए में बेचे जाने का प्रस्ताव है।
- समिति ने इसे “निजी घरानों की मिलीभगत से तैयार किया गया दस्तावेज़” बताया।
2020 का समझौता: अब क्यों चर्चा में?
- संघर्ष समिति ने नियामक आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार को 5 अक्टूबर 2020 के लिखित समझौते की याद दिलाई।
- उस समझौते में तय हुआ था कि बिजली कर्मियों को विश्वास में लिए बिना निजीकरण नहीं होगा।
- समिति का कहना है कि मौजूदा RFP सीधे उस समझौते का उल्लंघन है।
“लूट का दस्तावेज़” क्यों कहा जा रहा है?
- RFP को तैयार करने वाले Grant Thornton पर आरोप है कि उसने अवैध नियुक्ति और मिलीभगत से यह मसौदा बनाया।
- समिति का कहना है कि यह दस्तावेज़ कुछ चुनिंदा निजी घरानों को फायदा पहुँचाने के लिए तैयार किया गया है।
- तुलना में उन्होंने आगरा मॉडल का उदाहरण दिया, जहाँ टॉरेंट पावर को फ्रैंचाइजी के तहत बिजली वितरण दिया गया और
- कंपनी ने प्रतिवर्ष ₹800 करोड़ का मुनाफ़ा कमाया
- जबकि पावर कॉरपोरेशन को ₹1000 करोड़ का घाटा हुआ।
गोपनीय फाइलों पर भी आरोप
- समिति ने दावा किया कि निदेशक वित्त निधि नारंग ने निजीकरण से जुड़ी 10 से अधिक फाइलों की छाया प्रति अपने पास रख ली है।
- समिति के मुताबिक यह गंभीर मामला है और आशंका है कि गोपनीय दस्तावेज़ बाहर लीक हो सकते हैं।
बिजली कर्मियों का अल्टीमेटम
- संघर्ष समिति ने कहा कि यदि आयोग ने RFP को मंजूरी दी तो वे नियामक आयोग कार्यालय पर मौन प्रदर्शन करेंगे।
- साथ ही, पूरे प्रदेश में जन संपर्क अभियान चलाकर जनता को निजीकरण के “खतरों और घोटालों” से अवगत कराया जाएगा।
निष्कर्ष
बिजली निजीकरण का मुद्दा अब सिर्फ नीतिगत निर्णय नहीं रहा, बल्कि यह एक राजनीतिक और जनांदोलन का विषय बन चुका है।
संघर्ष समिति का दावा है कि यह केवल निजीकरण नहीं बल्कि “एक मेगा घोटाला” है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या नियामक आयोग RFP को मंजूरी देगा या बिजली कर्मचारियों के आंदोलन को देखते हुए कोई नया रास्ता निकालेगा।










