विशेष रिपोर्ट
CET में शिक्षक व्यवस्था के चौकीदार ? चप्पल गिनों, दिशा दिखाओ
✍🏻 डॉ. सत्यवान सौरभ | Edited by: Target TV Live Desk
“हमें परीक्षा केंद्र दो, न कि बस अड्डा!” — हरियाणा में CET परीक्षा ड्यूटी को लेकर शिक्षकों का फूटा आक्रोश
हरियाणा सरकार द्वारा CET परीक्षा के दौरान शिक्षकों को बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और पार्किंग जैसे गैर-शैक्षणिक स्थानों पर ड्यूटी देने का फैसला अब एक राज्यव्यापी आंदोलन का रूप ले रहा है। यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि शिक्षक वर्ग के आत्म-सम्मान और गरिमा पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।
मुख्य बिंदु (News Bullet Points):
- शिक्षक नहीं, व्यवस्थापक बना दिए गए — शिक्षकों को पेपर ड्यूटी के बजाय बस स्टैंडों पर उम्मीदवारों को गाइड करने, ट्रैफिक देखने और चप्पल गिनने जैसी भूमिकाओं में लगाया गया।
- राज्य भर में विरोध प्रदर्शन — पानीपत, करनाल, हिसार, गुरुग्राम सहित कई जिलों में शिक्षकों ने पोस्टर लेकर “हमें परीक्षा केंद्र दो” जैसे नारे लगाए।
- महिला शिक्षक का वीडियो वायरल — एक महिला शिक्षिका ने आक्रोश में कहा: “हम शिक्षक हैं, ट्रैफिक इंस्पेक्टर नहीं।” वीडियो को सोशल मीडिया पर लाखों बार देखा गया।
- बिना मूलभूत सुविधाएं, बिना प्रशिक्षण ड्यूटी — गर्मी में छाया तक नहीं, पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं। फिर भी शिक्षकों को भीड़ नियंत्रित करने की जिम्मेदारी।
- परीक्षा केंद्रों पर आउटसोर्स स्टाफ — जहां शिक्षक व्यवस्था देख रहे थे, वहीं पेपर कक्षों में प्राइवेट कर्मचारियों से काम लिया गया।
- सरकारी चुप्पी और राजनीतिक निष्क्रियता — न HSSC न शिक्षा विभाग और न ही स्थानीय प्रशासन ने अब तक कोई ठोस जवाब या समाधान दिया। संभावित बहिष्कार की चेतावनी — शिक्षकों ने अगली परीक्षाओं के बहिष्कार की चेतावनी दी है अगर इस प्रकार की ड्यूटी दोबारा दी गई।
शिक्षक की भूमिका: एक व्यवस्था या एक दर्शन?
हरियाणा की CET परीक्षा में शिक्षकों को जिस तरह ‘पार्किंग असिस्टेंट’ या ‘ड्राइवर मैनेजर’ जैसी भूमिकाओं में लगाया गया, उससे एक बड़ा सवाल खड़ा होता है —
क्या हम शिक्षक को कर्मचारी के रूप में देखना चाहते हैं या समाज के बौद्धिक स्तंभ के रूप में?
विश्लेषण: गलती सिर्फ सिस्टम की नहीं, सोच की भी है
- शिक्षक अनुशासन का रक्षक होता है, न कि यातायात का।
- प्रशासनिक तर्क (“स्टाफ की कमी”) उचित हो सकता है, पर वैकल्पिक विकल्प जैसे NCC/NSS या पुलिस वालंटियर्स क्यों नहीं?
- शिक्षक का मनोबल टूटता है, जब उसे उसके ज्ञान की बजाय उसकी “हाज़िरी” के आधार पर ड्यूटी दी जाती है।
- इसका असर भविष्य की पीढ़ियों पर पड़ेगा, जो ऐसे शिक्षकों से शिक्षा लेंगे जो खुद अपमानित महसूस करते हैं।
समाधान की दिशा
- ड्यूटी में पारदर्शिता — शिक्षकों को केवल शैक्षणिक कार्य में लगाया जाए।
- अकादमिक क्षमता का सम्मान — शिक्षकों की उपस्थिति परीक्षा केंद्रों में अनिवार्य की जाए।
- वैकल्पिक स्टाफिंग विकल्प — ट्रैफिक और गाइडेंस के लिए अन्य प्रशिक्षित कर्मचारी नियुक्त हों।
- शिक्षक संगठनों से संवाद — निर्णय लेने से पहले प्रतिनिधियों से राय ली जाए।
“शिक्षा बचाइए, शिक्षक को मत खोइए”
यदि यही चलता रहा तो शिक्षक केवल “ड्यूटी नंबर 34, बस स्टैंड” बनकर रह जाएंगे।
और अगली पीढ़ियाँ जब पूछेंगी —
“गुरु जी, आप चप्पल क्यों गिनते थे?”
तो हमारे पास कोई उत्तर नहीं होगा।
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