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बिजनौर DFO पर लगा ₹25,000 का जुर्माना

RTI आदेश: बिजनौर DFO पर लगा ₹25,000 का जुर्माना

बिजनौर: उत्तर प्रदेश सूचना आयोग ने सामाजिक वानिकी प्रभाग, बिजनौर के प्रभागीय निदेशक (जन सूचना अधिकारी) ज्ञान सिंह पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया है। यह दंड सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 की धारा 20(1) के तहत इसलिए लगाया गया क्योंकि उन्होंने मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं कराई और आयोग के आदेशों की अनदेखी की।

मामले की पृष्ठभूमि

बिजनौर निवासी अनुज सोती ने मार्च 2020 में नमामि गंगे योजना के तहत आपूर्ति किए गए 2000 RCC पोलों और धामपुर रेंज में आवास निर्माण निविदा से जुड़ी फाइलों की जानकारी मांगी थी। हालांकि, विभाग ने दावा किया कि 18 अगस्त 2020 की रात भारी बारिश के कारण बेसमेंट में रखी फाइलें पानी में भीगकर नष्ट हो गईं।

अनुज सोती ने इस दावे पर संदेह जताया और कहा कि उस दिन जिले में ऐसी कोई असामान्य बारिश नहीं हुई थी जो पत्रावलियों को नष्ट कर दे। उन्होंने आरोप लगाया कि सूचना न देने के लिए बारिश का बहाना बनाया जा रहा है।

सूचना आयोग की कार्रवाई

सूचना आयोग ने इस मामले में कई सुनवाई कीं:

  • 7 नवंबर 2024: आयोग ने विभाग से यह स्पष्ट करने को कहा कि कुल कितनी फाइलें नष्ट हुईं, उनकी कोई सूची बनी या नहीं, और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को बचाने के लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था की गई?
  • 4 दिसंबर 2024 और 31 दिसंबर 2024: विभाग के जन सूचना अधिकारी ज्ञान सिंह सुनवाई में उपस्थित नहीं हुए और न ही मांगी गई सूचना उपलब्ध कराई।
  • 24 फरवरी 2025: फिर से अधिकारी गैरहाजिर रहे और कारण बताओ नोटिस का भी जवाब नहीं दिया।

₹25,000 का अर्थदंड और वेतन से कटौती का आदेश

आयोग ने ज्ञान सिंह को सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रति गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाने का दोषी ठहराया। इसके तहत, ₹25,000 का जुर्माना उनके वेतन से काटकर वसूली करने का आदेश दिया गया है।

प्रशासनिक लापरवाही या सूचना छुपाने की कोशिश?

इस मामले ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • यदि बारिश के कारण दस्तावेज नष्ट हुए, तो विभाग के पास नष्ट हुई फाइलों की सूची और उनकी पुनःप्राप्ति की प्रक्रिया होनी चाहिए थी।
  • अधिकारी बार-बार सुनवाई से अनुपस्थित रहे, जिससे यह संदेह बढ़ता है कि जानबूझकर सूचना छिपाई जा रही थी।

सूचना अधिकार की अहमियत

RTI अधिनियम नागरिकों को प्रशासन से जवाबदेही लेने का अधिकार देता है। इस मामले में सूचना न मिलने और अधिकारियों के रवैये ने दिखाया कि सरकारी विभागों में पारदर्शिता को लेकर अभी भी गंभीर खामियां मौजूद हैं। आयोग का यह आदेश सूचना अधिकार कानून को सख्ती से लागू करने और जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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