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ज़माने के संग रंग बदलती होली

ज़माने के संग रंग बदलती होली

होली रंगों, उमंगो और भाईचारे का त्यौहार। एक ऐसा पर्व जो सदियों से समाज में प्रेम, सौहार्द और आपसी मेल-जोल का संदेश देता आया है। यह वो त्यौहार है, जो दुश्मनी को दोस्ती में बदलने की ताकत रखता है और मन के मैल को रंगों की बारिश में धोकर रिश्तों को नई ताजगी से भर देता है। मगर अफसोस, बदलते वक्त के साथ होली की यह मासूमियत और सच्चा उल्लास धीरे-धीरे धुंधला होता जा रहा है। आज की होली, बीते दिनों की उस रंग-बिरंगी होली से कहीं अलग सी लगती है।

बीते दौर की होली: जब रंगों में रौनक थी

पहले की होली एक महीने पहले से ही अपने रंग बिखेरने लगती थी। वसंत पंचमी के बाद से ही गांवों और कस्बों में ढोलक-चंग की थाप गूंजने लगती थी। बच्चे गलियों में टोली बनाकर “होली का दान” मांगते, घर-घर जाकर फगुआ गाते, और अपनी मस्ती में झूमते। कोई डांट भी देता तो वे खिलखिलाकर हंस पड़ते। मोहल्लों में हंसी-ठिठोली की गूंज सुनाई देती, और हर गली में होली की तैयारियों की धूम मच जाती।

महिलाएं आंगन में बैठकर टेसू और पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग बनातीं, गुझिया, पापड़, मठरी और मालपुए जैसे पकवानों की सुगंध से घर-आंगन महक उठते। होलिका दहन की रात लोग एक साथ एकत्र होकर बुराई के अंत और अच्छाई की जीत का जश्न मनाते। और फिर होली के दिन — वो नज़ारा ही कुछ और होता था! हर कोई रंगों से सराबोर, गली-गली में चंग की थाप पर नाच-गाना, और फगुआ गीतों की धुन पर थिरकते लोग। वह होली सिर्फ रंगों की नहीं, बल्कि दिलों के मिलन की होली थी।

बदलते वक्त के साथ बदलती होली

समय बदला, और होली की तस्वीर भी। आज होली का उत्साह सोशल मीडिया पर “हैप्पी होली” के मैसेज तक सिमटने लगा है। पहले की तरह गली-मोहल्लों में बच्चों की टोलियां नहीं दिखतीं, न ही घर के आंगन में फाग सुनाई देता है। अब प्राकृतिक रंगों की जगह केमिकल युक्त रंगों ने ले ली है, और मिलकर खेलने की परंपरा की जगह लोगों ने अपने घरों में रहना बेहतर समझा है।

पहले लड़कियां भी पूरे उत्साह के साथ होली खेलती थीं, बिना किसी डर के खुलकर मस्ती करती थीं। मगर आज बढ़ती असुरक्षा और समाज की बदलती सोच ने त्योहारों की खुली आज़ादी पर कहीं न कहीं बंदिश लगा दी है। पहले के पड़ोस, जहां हर घर परिवार जैसा लगता था, अब वहां अजनबीपन पसरने लगा है।

सामाजिक बदलाव और होली पर असर

समाज में बढ़ते तनाव, आपसी मतभेद और लोगों की अलगाव की भावना ने भी होली की आत्मा को ठेस पहुंचाई है। पहले लोग गिले-शिकवे भुलाकर गले मिलते थे, लेकिन आज छोटी-छोटी बातों पर रिश्तों में कड़वाहट भर जाती है। जहां पहले होली पर लोग अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के घर जाकर अबीर-गुलाल लगाते थे, वहां अब व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम पर एक डिजिटल मैसेज ही काफी मान लिया जाता है।

आशा की नई किरण: हम बदल सकते हैं तस्वीर

लेकिन क्या वाकई हम उस पुरानी, रंगों से भरी, खुशियों की होली को वापस नहीं ला सकते? ज़रूर ला सकते हैं! त्योहारों की असली ताकत उनके पीछे छुपे संदेश में है — और होली हमें सिखाती है कि जीवन के असली रंग प्यार, अपनापन और भाईचारे में छिपे हैं। अगर हम मिलकर फिर से पुरानी परंपराओं को अपनाएं, छोटी-छोटी बातों को भुलाकर रिश्तों को तवज्जो दें, और सच में दिल से लोगों के साथ त्योहार मनाएं, तो होली की वो खोई हुई चमक लौट सकती है।

आइए, इस बार की होली पर एक कदम आगे बढ़ाएं। घरों से बाहर निकलकर अपनों से मिलें, पुराने दोस्तों को बुलाएं, पड़ोसियों के दरवाजे पर गुलाल लेकर खड़े हों, और कहें — “बुरा न मानो, होली है!” क्योंकि जब तक दिलों में रंग नहीं होंगे, तब तक होली अधूरी है। और सच तो यह है कि त्योहार तभी जिंदा रहते हैं, जब हम उनके रंगों को अपने रिश्तों में घोलते हैं।

तो इस बार, क्यों न होली को सिर्फ एक रस्म से निकालकर, फिर से एक ज़िंदा एहसास बना दें? क्यों न फिर से फाग गाएं, ढोल की थाप पर नाचें, और बच्चों को बताएं कि होली सिर्फ रंगों का नहीं, बल्कि दिलों के मिलने का त्यौहार है? आइए, इस बार की होली परंपरा, प्रेम और उमंग के नए रंगों से सराबोर करें — ताकि फाल्गुन की बयार में फिर से वही पुरानी खुशबू लौट आए।

क्योंकि होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि ज़िंदगी को रंगीन बनाने की एक वजह है।

प्रियंका सौरभ

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