Target Tv Live

पढ़े प्रियंका सौरभ की कविता “आँगन-आँगन रंग हो”

         आँगन-आँगन रंग हो

भूमिका:
होली के रंगों से सजी इस कविता में कवयित्री प्रियंका सौरभ ने प्रेम, सौहार्द और उल्लास का खूबसूरत चित्रण किया है। कविता में होली के त्योहार की उमंग और उसके सामाजिक महत्व को उजागर करते हुए, आपसी बैर-भाव को त्यागकर प्रेम और भाईचारे की भावना को अपनाने का संदेश दिया गया है। कवयित्री ने होली के रंगों को सिर्फ बाहरी सजावट के रूप में नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने वाली कड़ी के रूप में प्रस्तुत किया है।
कविता में गली-चौबारों की मस्ती, गुलाल की खुशबू, और हर उम्र के लोगों के उल्लास को जीवंतता से चित्रित किया गया है। फागुन के गीत और रंग-बिरंगे अबीर-गुलाल के माध्यम से यह कविता हमें याद दिलाती है कि होली न केवल एक पर्व है, बल्कि प्रेम, एकता और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक भी है।

इस प्रकार, यह कविता होली के सांस्कृतिक महत्व को उजागर करते हुए हमें एक-दूसरे के प्रति सम्मान, स्नेह और अपनापन बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है।

आँगन-आँगन रंग हो

 

होली के त्यौहार में, ऐसी उठे तरंग।
तन-मन में जो प्यार की, भर दे ख़ूब उमंग॥
आँगन-आँगन रंग हो, हो रंगीला फाग।
बैर-भाव को छोड़कर, मिलें सभी के राग॥
झूम उठे उल्लास से, क्या बूढ़े क्या बाल।
उड़े ख़ूब इस फाग में, सौरभ रंग गुलाल॥
सड़क-गली हर चौक पर, मचे फाग की धूम।
रार बैर की छोड़कर, राग प्रीत ले चूम॥
होली के त्यौहार में, इतनी तो हो बात।
सबके गालों को मिले, रंगों की सौगात॥
आते होली फाग यूं, देते हैं सन्देश।
प्रेम परस्पर दे सदा, मिटे हृदय से क्लेश॥
फागुन में यूं प्यार से, गा होली के गीत।
पुष्प खिले बस चाह के, होकर के मनमीत॥
प्रियंका सौरभ

Leave a Comment

यह भी पढ़ें