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सफाई कर्मी की आत्महत्या: व्यक्तिगत संघर्ष या संस्थागत उत्पीड़न की त्रासदी ?

सफाई कर्मी की आत्महत्या: व्यक्तिगत संघर्ष या संस्थागत उत्पीड़न की त्रासदी ?

अवनीश त्यागी 

BIJNOR. बिजनौर के पंचायती राज विभाग में कार्यरत सफाई कर्मी बालेश उर्फ बंटी (38) की आत्महत्या ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अपने घर में चुनरी का फंदा लगाकर जीवन समाप्त करने वाले इस कर्मचारी की मौत ने न केवल उसके परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर भी उंगली उठाई है।

घरेलू कलह या मानसिक तनाव?
मामले की शुरुआती जांच में पुलिस ने आत्महत्या की वजह घरेलू कलह बताई है। बालेश की पत्नी ने कई बार फोन किया, लेकिन जवाब न मिलने पर पड़ोसियों से मदद मांगी। जब पड़ोसी ने घर के अंदर देखा, तो बालेश का शव छत के जाल से लटकता मिला। परिजन सदमे में हैं और प्रशासन ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।

कारणों की परतें: प्रशासनिक शोषण की आहट?
स्थानीय कर्मचारियों और ग्रामीणों की मानें, तो इस आत्महत्या के पीछे सिर्फ पारिवारिक कलह नहीं, बल्कि संस्थागत दबाव की बड़ी भूमिका हो सकती है। कुछ कर्मचारियों ने आरोप लगाया है कि ब्लॉक में तैनात एडीओ पंचायत राकेश अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर अनैतिक दबाव बनाता था। आरोप है कि राकेश, अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ के चलते कर्मचारियों के खिलाफ झूठी शिकायतें करवाकर उगाही करता था।

निलंबन और तबादले की दास्तान
बालेश को पहले हल्दौर ब्लॉक में तैनात किया गया था, लेकिन निलंबन के बाद उसकी तैनाती गोपालपुर गांव में कर दी गई। हालांकि, गांव के प्रधान के अनुसार, वह पिछले दो महीनों से ड्यूटी पर नहीं आ रहे थे। यह अनुपस्थिति कहीं न कहीं उनके मानसिक तनाव का संकेत देती है।

प्रशासन की भूमिका पर सवाल
सूत्रों की मानें, तो एडीओ पंचायत की कथित मनमानी और अवैध पोस्टिंग को उच्च अधिकारियों का मौन समर्थन प्राप्त है। कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यदि उनके साथ भी कुछ गलत होता है, तो उसके लिए जिम्मेदार सिर्फ एडीओ पंचायत होंगे।

न्याय की मांग और प्रशासनिक सुधार की जरूरत
बालेश की आत्महत्या एक चेतावनी है कि अगर निचले स्तर के कर्मचारियों की आवाज़ को अनसुना किया जाता रहा, तो ऐसी घटनाएं दोहराई जा सकती हैं। कर्मचारी संघ और स्थानीय ग्रामीण अब निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

यह घटना हमें याद दिलाती है कि संस्थाओं की बुनियाद सिर्फ नीतियों पर नहीं, बल्कि उनके कर्मचारियों की भलाई पर टिकी होती है। अगर एक सफाई कर्मी मानसिक प्रताड़ना के चलते आत्महत्या करने पर मजबूर होता है, तो यह पूरे सिस्टम के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

अब सवाल ये है — क्या प्रशासन इस घटना से सबक लेगा, या फिर बालेश की मौत भी एक और दबा हुआ सच बनकर रह जाएगी ?

 

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