बिजनौर में जबरन धर्म परिवर्तन और निकाह: कानून, सामाजिक ताना-बाना और निष्पक्ष न्याय की कसौटी
रिपोर्ट : अवनीश त्यागी
उत्तर प्रदेश में धर्म परिवर्तन से जुड़े मामलों पर कड़ी नजर रखी जा रही है। इसी कड़ी में बिजनौर के धामपुर कस्बे में एक युवक के कथित जबरन धर्म परिवर्तन और निकाह का मामला सामने आया है। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी अहम है।
क्या है पूरा मामला ?
बिजनौर के धामपुर कस्बे में रहने वाले मुकुल नामक युवक का प्रेम संबंध शायमा नाम की युवती से था। पीड़ित के पिता जसवंत सिंह ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि 8 फरवरी 2025 को शायमा, उसकी माँ रुखसाना और पिता शाहिद ने शादी का लालच देकर मुकुल का जबरन धर्म परिवर्तन करा दिया और उसका नाम माहिर अंसारी रख दिया। इसके बाद पुराना धामपुर स्थित एक मदरसे में उसका निकाह करा दिया गया।
शिकायत मिलते ही पुलिस ने कार्रवाई करते हुए मौलाना कारी इरशाद, शायमा, रुखसाना, शाहिद और गुफरान के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया।
कानूनी पहलू: धर्म परिवर्तन पर सख्ती क्यों?
उत्तर प्रदेश सरकार ने 2021 में धर्म परिवर्तन पर रोकथाम के लिए सख्त कानून लागू किया था। इस अधिनियम के तहत यदि कोई व्यक्ति जबरदस्ती, धोखे, लालच या दबाव देकर धर्म परिवर्तन कराता है, तो यह अपराध की श्रेणी में आता है। दोषियों को 1 से 10 साल तक की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है।
इस मामले में पुलिस ने तत्परता दिखाई, जो सरकार की जीरो-टॉलरेंस नीति को दर्शाता है। लेकिन यह भी जरूरी है कि कार्रवाई निष्पक्ष हो और साक्ष्यों के आधार पर की जाए, न कि केवल आरोपों के आधार पर।
सामाजिक पहलू: प्रेम, धर्म और जबरदस्ती के दावे
धर्म परिवर्तन और विवाह का विषय सामाजिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील होता है। ऐसे मामलों में अक्सर दो पक्ष सामने आते हैं—एक जो इसे प्रेम और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला मानता है और दूसरा जो इसे जबरन धर्मांतरण का षड्यंत्र कहता है।
यदि मुकुल का धर्म परिवर्तन वास्तव में उसकी सहमति के बिना हुआ है, तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि उसके मौलिक अधिकारों का हनन भी है। लेकिन अगर यह दोनों की सहमति से हुआ है, तो फिर यह एक निजी मामला बन जाता है, जिस पर कानूनी हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए।
क्या कहते हैं ऐसे मामलों के आंकड़े ?
उत्तर प्रदेश में 2021 में धर्म परिवर्तन कानून लागू होने के बाद ऐसे कई मामले सामने आए हैं। इनमें से कुछ में सख्त सजा हुई, जबकि कई मामलों में जांच के दौरान यह पाया गया कि धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से हुआ था। ऐसे मामलों में झूठे आरोपों की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता, जो किसी विशेष समुदाय के खिलाफ नकारात्मक धारणा बना सकते हैं।
राजनीतिक प्रभाव और सांप्रदायिक तनाव का खतरा
ऐसे मामलों को राजनीतिक रूप से भुनाने की भी संभावना रहती है। हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ सकता है, जिससे सांप्रदायिक तनाव गहरा सकता है। इससे न केवल सामाजिक सौहार्द्र प्रभावित होता है, बल्कि प्रशासन के लिए भी कानून व्यवस्था बनाए रखना चुनौती बन जाता है।
क्या होना चाहिए आगे का कदम ?
- गहन और निष्पक्ष जांच: यह सुनिश्चित किया जाए कि मामले की जांच साक्ष्यों के आधार पर हो, न कि केवल भावनात्मक या सांप्रदायिक दबाव में।
- कानून का संतुलित क्रियान्वयन: यदि धर्म परिवर्तन जबरदस्ती हुआ है, तो सख्त सजा दी जाए। लेकिन यदि दोनों पक्षों की सहमति से हुआ है, तो अनावश्यक हस्तक्षेप न किया जाए।
- सामाजिक जागरूकता: समाज में जागरूकता फैलाई जाए कि विवाह और धर्म परिवर्तन व्यक्तिगत निर्णय होते हैं, और इन्हें किसी दबाव या साजिश का माध्यम नहीं बनना चाहिए।
- संवेदनशीलता बनाए रखना: मीडिया और राजनेताओं को इस मामले को तूल देकर सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने से बचना चाहिए।
बिजनौर का यह मामला उत्तर प्रदेश में धर्म परिवर्तन पर सख्ती की एक और मिसाल बन सकता है। हालांकि, यह जरूरी है कि पुलिस और न्यायालय निष्पक्षता के साथ काम करें ताकि सजा केवल दोषियों को मिले, न कि किसी निर्दोष को। समाज के लिए भी यह सोचने का अवसर है कि प्रेम, विवाह और धर्म परिवर्तन को किस हद तक व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय माना जाए और कहां कानून का हस्तक्षेप आवश्यक हो।













