उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला: बिना सुनवाई निष्कासन आदेश अवैध घोषि
प्रयागराज : उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में बिना पूर्व सुनवाई के जारी किए गए निष्कासन आदेश को अवैध करार दिया है। अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा कर्मचारी सेवा नियमावली, 1973 और उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक नियमावली, 1999 के तहत दंड लगाने के लिए निश्चित प्रक्रियाओं का पालन किया जाना आवश्यक है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इन प्रक्रियाओं की अवहेलना करके पारित आदेश विधि-सम्मत नहीं माना जा सकता।
क्या है पूरा मामला ?
मामला WRITA संख्या 801/2025 से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता परमेश सिंह सोलंकी ने अपने निष्कासन आदेश को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीश कुमार उपाध्याय ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को बिना किसी नोटिस या सुनवाई के सेवा से निष्कासित कर दिया गया, जो कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
दूसरी ओर, प्रतिवादी पक्ष के वकील भूषण प्रताप सिंह ने यह दलील दी कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति विवादित थी और नियमों के अनुसार सही नहीं थी। प्रतिवादी पक्ष ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति उसके मृत पिता की जगह डायरेक्ट हायरिंग के तहत हुई थी और बाद में उसे नियमित किया गया, जो नियमों के विरुद्ध था।
अदालत का फैसला
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि बिना किसी पूर्व सुनवाई के निष्कासन आदेश पारित करना असंवैधानिक है और उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा सेवा नियमावली का उल्लंघन करता है। न्यायालय ने दिनांक 09.01.2025 को पारित जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, बिजनौर के आदेश को अवैध घोषित करते हुए निरस्त कर दिया।
महत्वपूर्ण बिंदु:
- प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: बिना नोटिस और सुनवाई के निष्कासन अवैध।
- नियमों की अनदेखी: उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा सेवा नियमावली का पालन नहीं किया गया।
- पुनः विचार की जरूरत: अदालत ने नए सिरे से विधि सम्मत आदेश पारित करने की बात कही।
प्रभाव और आगे की राह
इस फैसले का प्रभाव प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों पर व्यापक रूप से पड़ सकता है। यह उन मामलों के लिए भी एक नजीर बनेगा जहां कर्मचारियों को बिना उचित प्रक्रिया के सेवा से निष्कासित किया जाता है। अब प्रशासन को इस प्रकार के मामलों में अधिक सतर्क रहना होगा और नियमानुसार कार्यवाही करनी होगी।
इस निर्णय के बाद सरकार और संबंधित विभागों पर कानूनी प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन करने का दबाव बढ़ सकता है। वहीं, याचिकाकर्ता के पक्ष में आए इस फैसले से अन्य सरकारी कर्मचारियों को भी राहत मिल सकती है, जिन्हें इसी प्रकार की परिस्थितियों का सामना करना पड़ा हो।













