प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना: किसानों के लिए वरदान या अधूरी रणनीति ?

योजना का परिचय
भारत की अर्थव्यवस्था कृषि पर अत्यधिक निर्भर है, लेकिन इस क्षेत्र में कई संरचनात्मक चुनौतियाँ बनी हुई हैं, जिनमें बाज़ार की अक्षमताएँ, खंडित भूमि जोत, ऋण की सीमित पहुँच और जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव शामिल हैं। हाल के केंद्रीय बजट में प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना और किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) ऋण सीमा में वृद्धि जैसी पहलें शुरू की गई हैं, जिनका उद्देश्य किसानों की वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ करना है।
इस लेख में हम इन पहलों के प्रभाव का विश्लेषण करेंगे और यह समझने का प्रयास करेंगे कि क्या ये उपाय भारतीय किसानों को वास्तव में आर्थिक रूप से सशक्त बना सकते हैं या फिर ये मात्र अस्थायी समाधान हैं।
1. लक्षित वित्तीय सहायता बनाम सामान्य सब्सिडी
सरकार ने प्रत्यक्ष सब्सिडी की तुलना में फसल-विशिष्ट और क्षेत्रीय आवश्यकताओं पर आधारित वित्तीय सहायता को प्राथमिकता दी है।
तेलंगाना में डिजिटल सलाहकार सेवाओं और मृदा स्वास्थ्य निगरानी से धान की पैदावार और बाजार की कीमतों में सुधार हुआ है।
ऋण सीमा को ₹3 लाख से ₹5 लाख तक बढ़ाया गया जिससे किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बीज, उर्वरक और आधुनिक कृषि उपकरणों पर अधिक खर्च करने का अवसर मिला।
मध्य प्रदेश में संकर मक्का किस्मों को अपनाने से उत्पादन में वृद्धि देखी गई, जिससे किसानों की आय बढ़ी।
राजस्थान में सूखा-प्रतिरोधी बाजरा किस्मों के उपयोग से किसानों ने कम वर्षा के बावजूद उत्पादन बनाए रखा।
➡️ निष्कर्ष: सब्सिडी को सीधे देने के बजाय कृषि क्षेत्र में डिजिटल और संरचनात्मक सुधार लाने का प्रयास हो रहा है, जिससे किसानों को उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप सहायता मिल सके।
2. जलवायु-लचीली खेती और उच्च उपज वाले बीज
धन-धान्य कृषि योजना का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करना है।
उत्तर प्रदेश में जलवायु-लचीली गेहूँ की किस्मों को अपनाकर तापमान परिवर्तन के कारण होने वाले नुकसान को कम किया गया है।
गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में सिंचाई और मृदा प्रबंधन में सुधार के कारण कपास की पैदावार में वृद्धि हुई है।
महाराष्ट्र और कर्नाटक में ड्रिप सिंचाई और एआई-संचालित मृदा विश्लेषण जैसी सटीक खेती तकनीकों से उत्पादकता बढ़ी है।
➡️ निष्कर्ष: जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए योजना के अंतर्गत जल-कुशल और टिकाऊ खेती तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन यह तब ही सफल होगा जब छोटे किसानों तक ये तकनीकें वास्तविक रूप से पहुँचें।
3. किसानों की ऋण सुविधा और कर्ज़ संकट
किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) ऋण सीमा बढ़ाकर ₹5 लाख करने से छोटे किसानों को अधिक ऋण मिल रहा है, जिससे उनकी साहूकारों पर निर्भरता कम हो रही है।
पंजाब और हरियाणा में छोटे किसानों ने नई ऋण सीमा का उपयोग कर आधुनिक कृषि उपकरण खरीदे, जिससे उत्पादकता बढ़ी और मैनुअल श्रम की निर्भरता घटी।
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में ऋण पुनर्गठन कार्यक्रम ने किसानों की आत्महत्याओं की संख्या कम करने में मदद की।
➡️ निष्कर्ष: ऋण सीमा बढ़ने से किसानों को वित्तीय राहत मिली है, लेकिन यदि आय विविधीकरण के उपाय नहीं किए गए तो किसान ऋण के जाल में फँस सकते हैं।
4. संरचनात्मक समस्याएँ: कृषि बाजार, निर्यात और मूल्य निर्धारण
हालांकि योजना से किसानों को ऋण और तकनीकी सहायता मिल रही है, लेकिन बाज़ार की समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं।
2023 में कर्नाटक के टमाटर किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा, क्योंकि अधिक उत्पादन के कारण बाजार में कीमतें गिर गईं।
भारत में कृषि निर्यात मात्र 2-3% है, जिससे किसान अंतरराष्ट्रीय बाजार तक नहीं पहुँच पा रहे हैं।
गुजरात के AMUL मॉडल की तरह सहकारी खेती को अपनाने से किसानों की आय बढ़ सकती है।
ओडिशा में बाजरा मिशन जलवायु-लचीली फसलों को बढ़ावा देने का एक सफल उदाहरण है।
➡️ निष्कर्ष: किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार को एमएसपी कवरेज, अनुबंध खेती, निर्यात नीति और प्रसंस्करण सुविधाओं पर अधिक ध्यान देना होगा।
5. टिकाऊ कृषि और तकनीकी एकीकरण की आवश्यकता
➡ डिजिटल भूमि रिकॉर्ड, एआई-संचालित खेती और मूल्य निर्धारण उपकरण भारतीय कृषि को अधिक पारदर्शी और कुशल बना सकते हैं।
➡ ई-एनएएम (राष्ट्रीय कृषि बाजार) जैसे प्लेटफ़ॉर्म किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त करने में सहायता कर सकते हैं।
➡ कोल्ड स्टोरेज और वेयरहाउसिंग में निवेश करके कटाई के बाद के नुक़सान को कम किया जा सकता है, जैसा कि महाराष्ट्र में आम के कोल्ड स्टोरेज नेटवर्क के कारण देखा गया।
➡️ निष्कर्ष: तकनीक और डिजिटल कृषि समाधानों को अपनाकर किसानों की आय और कृषि उत्पादकता दोनों को बढ़ाया जा सकता है।
निष्कर्ष और आगे का रास्ता
प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना और किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) ऋण सीमा वृद्धि किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रही हैं। हालाँकि, कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं:
✅ सकारात्मक पहलू:
✔️ कृषि ऋण और वित्तीय सहायता में सुधार
✔️ जलवायु-लचीली खेती और उच्च उपज वाले बीजों को बढ़ावा
✔️ डिजिटलीकरण और आधुनिक तकनीकों का समावेश
❌ चुनौतियाँ:
❌ कृषि उत्पादों की बाजार मूल्य निर्धारण समस्या
❌ अनुबंध खेती और एमएसपी कवरेज का अभाव
❌ प्रसंस्करण और भंडारण सुविधाओं की कमी
❌ कृषि निर्यात नीति की कमी
➡ भविष्य में आवश्यक कदम:
✔️ कृषि निर्यात को बढ़ावा देना और वैश्विक बाजारों तक किसानों की पहुँच बनाना
✔️ अनुबंध खेती और एमएसपी सुधार के माध्यम से किसानों की आय को स्थिर करना
✔️ प्रसंस्करण, कोल्ड स्टोरेज और वेयरहाउसिंग को मजबूत करना
✔️ डिजिटल कृषि और ई-एनएएम को बढ़ावा देना
➡ अंततः, यदि इन संरचनात्मक समस्याओं को हल किया जाए, तो प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना किसानों को धन-धान्य से पूर्ण बना सकती है, अन्यथा यह सिर्फ एक अल्पकालिक राहत बनकर रह जाएगी।
✍ प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार












