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बिजली कर्मियों का व्यापक प्रदर्शन: निजीकरण के खिलाफ संघर्ष की नई लहर

बिजली कर्मियों का व्यापक प्रदर्शन: निजीकरण के खिलाफ संघर्ष की नई लहर

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिजली के निजीकरण के प्रयासों के खिलाफ आज राजधानी लखनऊ सहित पूरे देश में बिजली कर्मचारियों का जोरदार विरोध प्रदर्शन हुआ। बिजली कर्मियों, जूनियर इंजीनियरों और अभियंताओं ने निजीकरण की प्रक्रिया को रोकने की मांग करते हुए राजधानी स्थित शक्तिभवन मुख्यालय का घेराव किया। इस प्रदर्शन का उद्देश्य उत्तर प्रदेश पॉवर कारपोरेशन द्वारा निजीकरण के लिए ट्रांजैक्शन कंसलटेंट की नियुक्ति के खिलाफ आवाज उठाना था।

शक्तिभवन पर प्रदर्शन और प्री-बिडिंग कॉन्फ्रेंस का रद्द होना

सुबह से ही हजारों बिजली कर्मचारी शक्तिभवन पर एकत्रित हो गए और दोपहर तक मुख्यालय का घेराव कर लिया। तय समय 11:30 बजे होने वाली प्री-बिडिंग कॉन्फ्रेंस प्रदर्शनकारियों के दबाव के कारण रद्द हो गई। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पॉवर कारपोरेशन के चेयरमैन ने गुपचुप तरीके से निजी कंसल्टेंट्स के साथ किसी अन्य स्थान पर मीटिंग की है, जो असंवैधानिक और पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ है।

संघर्ष समिति के नेताओं ने इस प्रक्रिया को “जल्दबाजी और घोटाले की आशंका” का संकेत देते हुए कहा कि किसी भी तरह के निजीकरण की प्रक्रिया पारदर्शी और नियमानुसार होनी चाहिए।

मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की अपील

संघर्ष समिति ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। समिति का कहना है कि मुख्यमंत्री के प्रभावी कदम ही पॉवर कारपोरेशन के चेयरमैन की मनमानी को रोक सकते हैं और बिजली के निजीकरण की प्रक्रिया को टाला जा सकता है।

प्रदेश और देशभर में विरोध प्रदर्शन

लखनऊ के अलावा उत्तर प्रदेश के वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर, गोरखपुर, मेरठ और आगरा जैसे सभी प्रमुख जिलों में भी बिजली कर्मचारियों ने बड़े स्तर पर प्रदर्शन किए। इसके साथ ही देश की अन्य राजधानीयों जैसे जम्मू, पटियाला, शिमला, देहरादून, मुंबई, चेन्नई, और कोलकाता में भी विरोध सभाएं आयोजित की गईं।

भविष्य की रणनीति

संघर्ष समिति ने ऐलान किया है कि निजीकरण का निर्णय वापस होने तक आंदोलन जारी रहेगा। 24 और 25 जनवरी को बिजली कर्मचारी काली पट्टी बांधकर काम करेंगे और 25 जनवरी को संघर्ष के अगले चरण की घोषणा की जाएगी।

विश्लेषण

यह प्रदर्शन केवल कर्मचारियों की नाराजगी का नहीं, बल्कि बिजली क्षेत्र के निजीकरण के खिलाफ जनआंदोलन का संकेत देता है। निजीकरण के समर्थकों का मानना है कि इससे बिजली आपूर्ति में सुधार होगा और वित्तीय घाटे को कम किया जा सकेगा, लेकिन कर्मचारी संगठन इसे “जनता और कर्मचारियों के हितों के खिलाफ” बताते हुए विरोध कर रहे हैं।

संघर्ष समिति का दावा है कि इस तरह का निजीकरण न केवल अनियमितताओं को बढ़ावा देगा बल्कि बिजली की दरों में भी भारी वृद्धि करेगा। प्रदर्शन में कर्मचारियों की एकजुटता और सरकार से प्रभावी हस्तक्षेप की मांग यह दिखाती है कि यह आंदोलन आने वाले दिनों में और व्यापक रूप ले सकता है।

बिजली क्षेत्र के इस मुद्दे पर सरकार का अगला कदम निर्णायक होगा। यदि संवाद और समाधान की पहल नहीं की गई, तो यह विरोध न केवल प्रदेश बल्कि देशव्यापी संकट का रूप ले सकता है।

 

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