पारिवारिक विवाद नहीं, गंभीर आपराधिक मामला फिर क्यों परिवार परामर्श केंद्र भेजी गई पीड़िता? प्रशासनिक भंवर में उलझ कर रह गया न्याय!
TargetTvLive स्पेशल | रिपोर्ट: अवनीश त्यागी
मुख्य बिंदु :
- मुख्य सवाल: जब मामला आपराधिक और धोखाधड़ी का था, तो परिवार परामर्श केंद्र क्यों भेजा गया?
- प्रशासनिक भंवर: पुलिस, परिवार परामर्श केंद्र, वन स्टॉप सेंटर और DDO कार्यालय के बीच फंसी फाइल।
- ताजा अपडेट: DDO कार्यालय में घंटों पूछताछ और आरोपी-पीड़िता का आमना-सामना।
- समयसीमा: घटना की शिकायत के 3 सप्ताह बीतने के बावजूद न्याय अब भी दूर।
बिजनौर (उत्तर प्रदेश): विकास भवन के प्रधान सहायक पर शादी का झांसा देकर 7 साल तक दैहिक शोषण, जबरन गर्भपात और धोखाधड़ी जैसे संगीन आरोप से जुड़ा मामला अब प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। घटना को तीन सप्ताह से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी जब पीड़िता को न्याय नहीं मिला, तो यह सवाल सबसे बड़ा बन गया है कि जब यह कोई आपसी पारिवारिक विवाद (Family Dispute) था ही नहीं, तो आखिर पुलिस ने मामले को ‘परिवार परामर्श केंद्र’ क्यों भेज दिया?
न्याय की आस में भटकती पीड़िता: पुलिस से लेकर विकास भवन तक उलझा सिस्टम
इस सनसनीखेज मामले में प्रशासनिक अमले और पुलिस की सुस्त कार्रवाई ने पीड़िता की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। शुरुआती दौर से ही मामले को एक गंभीर अपराध के रूप में दर्ज कर त्वरित कार्रवाई करने के बजाय इसे विभिन्न विभागों और केंद्रों के बीच फुटबॉल की तरह घुमाया जाता रहा है, जिसकी विस्तृत तस्वीर कुछ इस प्रकार है:
- परिवार परामर्श केंद्र की अनुचित राह: जानकारों और पीड़िता के करीबियों का कहना है कि आरोपी राजकुमार और पीड़िता के बीच कोई पति-पत्नी या पारंपरिक पारिवारिक रिश्ता नहीं था, बल्कि शादी का झूठा झांसा देकर शारीरिक शोषण (बलात्कार) और छल का मामला था। इसके बावजूद, पुलिस ने मामले को तुरंत गंभीर धाराओं में दर्ज कर गिरफ्तार करने के बजाय ‘परिवार परामर्श केंद्र’ के पाले में डाल दिया, जहाँ मामलों को सुलझाने और काउंसलिंग के नाम पर अक्सर समय बर्बाद होता है।
- वन स्टॉप सेंटर की औपचारिकताएं: पुलिस और परामर्श केंद्र के चक्रव्यूह से निकलने के बाद इस मामले को जिला कार्यक्रम अधिकारी के माध्यम से ‘वन स्टॉप सेंटर’ भेजा गया, जिससे पीड़िता को न्याय मिलने की प्रक्रिया और अधिक लंबी हो गई।
- DDO कार्यालय में पूछताछ और आमना-सामना का मानसिक दबाव: हाल ही में जब यह मामला जिला विकास अधिकारी (DDO) के पास पहुंचा, तो जांच के नाम पर पीड़िता को कार्यालय में घंटों बिठाकर लंबी पूछताछ की गई। हद तो तब हो गई जब प्रशासनिक जांच के नाम पर आरोपी और पीड़िता का आमना-सामना कराया गया, जिससे न्याय की गुहार लगा रही पीड़िता पर अतिरिक्त मानसिक प्रताड़ना का बोझ पड़ गया।
इस संबंध में पुलिस अधिकारियों से बात करने का प्रयास किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली l
TargetTvLive की विश्लेषणात्मक पड़ताल: क्या रसूखदारों को बचाने की हो रही है कोशिश?
TargetTvLive की संपादकीय टीम का मानना है कि जब एक सरकारी विभाग (विकास भवन) का कर्मचारी आपराधिक कृत्यों के घेरे में हो, तब पुलिस और प्रशासन की यह लंबी और पेचीदा कागजी प्रक्रियाएं कई गंभीर संदेह पैदा करती हैं।
- कानून का उल्लंघन या टालमटोल: बलात्कार, धोखाधड़ी और जबरन गर्भपात जैसे गैर-जमानती और संगीन मामलों में परिवार परामर्श केंद्र की कोई प्रासंगिकता नहीं होती। इसे भेजना सीधे तौर पर मामले को कमजोर करने या टालने की कोशिश की ओर इशारा करता है।
- पीड़िता की मानसिक प्रताड़ना: बार-बार अलग-अलग दफ्तरों (पुलिस थाना, परामर्श केंद्र, वन स्टॉप सेंटर और DDO ऑफिस) के चक्कर कटवाने और आरोपी के सामने आमنا-सामना कराने से पीड़िता का मनोबल टूटता है।
इस संबंध में पुलिस अधिकारियो अनेक बार बात करने का प्रयास किया गया लेकिन सफलता नहीं मिली ।
(TargetTvLive इस संवेदनशील प्रकरण पर लगातार पैनी नजर रखे हुए है। प्रशासनिक अधिकारियों की इस सुस्ती और मामले से जुड़े हर नए खुलासे को सबसे पहले देखने के लिए जुड़े रहें TargetTvLive के साथ।)












