120 शिकायतें, सिर्फ 9 का मौके पर समाधान… 25 मामलों पर संयुक्त टीमें क्यों? चांदपुर में मंडलायुक्त ने खोल दिया ‘गुणवत्ता’ वाले निस्तारण का असली पैमाना
रिपोर्ट: अवनीश त्यागी TargetTvLive
बिजनौर, 5 सितंबर।
संपूर्ण समाधान दिवस में शिकायतें सुनना प्रशासन की नियमित प्रक्रिया है, लेकिन असली सवाल शिकायतों की संख्या नहीं, बल्कि यह है कि फरियादी की समस्या वास्तव में खत्म हुई या सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में निस्तारित दिखा दी गई। चांदपुर तहसील में शनिवार को आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस में मंडलायुक्त मुरादाबाद मंडल संगीता सिंह के निर्देशों ने इसी बुनियादी सवाल को केंद्र में ला दिया।
मंडलायुक्त की अध्यक्षता में आयोजित समाधान दिवस में विभिन्न विभागों से संबंधित 120 शिकायती एवं प्रार्थना पत्र प्राप्त हुए। इनमें से 9 मामलों का मौके पर निस्तारण किया गया, जबकि 25 मामलों की जांच और समाधान के लिए संबंधित अधिकारियों की संयुक्त टीमें गठित करने के निर्देश दिए गए।
यह आंकड़ा अपने आप में प्रशासन के सामने मौजूद चुनौती की तस्वीर पेश करता है—क्योंकि प्राप्त 120 शिकायतों में से बड़ी संख्या के लिए मौके पर सुनवाई के बाद भी आगे की कार्रवाई आवश्यक रही।
TargetTvLive | रिपोर्ट: अवनीश त्यागी
सिर्फ ‘निस्तारण’ नहीं, मंडलायुक्त ने मांगा वास्तविक समाधान
समाधान दिवसों में अक्सर शिकायतों के निस्तारण की संख्या प्रशासनिक उपलब्धि के रूप में सामने आती है। लेकिन मंडलायुक्त संगीता सिंह ने इस परिपाटी से आगे बढ़ते हुए निस्तारण की गुणवत्ता को केंद्र में रखा।
उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि किसी शिकायत का समाधान केवल कागजी कार्रवाई पूरी कर देने तक सीमित नहीं होना चाहिए। जरूरत पड़ने पर स्थलीय निरीक्षण, तथ्यात्मक जांच और संबंधित विभागों के बीच समन्वय के बाद ही प्रभावी समाधान सुनिश्चित किया जाए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मंडलायुक्त ने शिकायतकर्ता की संतुष्टि को निस्तारण की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण आधार बताया।
यानी प्रशासन के लिए चुनौती अब केवल यह नहीं कि शिकायत कितनी जल्दी बंद हुई, बल्कि यह भी है कि जिस व्यक्ति ने शिकायत की, उसकी समस्या वास्तव में दूर हुई या नहीं।
25 मामलों में संयुक्त टीमें—प्रशासनिक समन्वय की परीक्षा
समाधान दिवस में प्राप्त 120 प्रार्थना पत्रों में से 25 मामलों के लिए संयुक्त टीमों के गठन का निर्देश विशेष महत्व रखता है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि इन मामलों का समाधान केवल एक विभागीय अधिकारी की रिपोर्ट से संभव नहीं माना गया। ऐसे मामलों में अलग-अलग विभागों की भूमिका, मौके की वास्तविक स्थिति और उपलब्ध अभिलेखों की जांच जरूरी होगी।
मंडलायुक्त ने टीमों को मौके पर जाकर जांच करने और गुणवत्तापरक समाधान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
यहीं से समाधान दिवस की असली परीक्षा शुरू होती है।
क्योंकि संयुक्त टीम बनना पहला कदम है; वास्तविक प्रशासनिक सफलता तब मानी जाएगी जब टीम की जांच के बाद निर्णय हो, कार्रवाई हो और फरियादी को उसके परिणाम की जानकारी मिले।
120 में 9 मौके पर निस्तारित—बाकी मामलों की निगरानी होगी अहम
समाधान दिवस में 120 शिकायतें प्राप्त हुईं और 9 का मौके पर निस्तारण हुआ। शेष मामलों को संबंधित विभागों को समयबद्ध तरीके से निस्तारित करने के निर्देश दिए गए।
ऐसे में आगे की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी फॉलो-अप होगी।
किस शिकायत पर कौन अधिकारी गया?
क्या स्थलीय जांच हुई?
क्या शिकायतकर्ता का पक्ष सुना गया?
क्या नियमों के अनुरूप निर्णय हुआ?
और सबसे अहम—क्या शिकायतकर्ता उस समाधान से संतुष्ट है?
इन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि समाधान दिवस महज शिकायतों के पंजीकरण और निस्तारण की प्रशासनिक प्रक्रिया रहा या वास्तव में जनसमस्याओं के समाधान का प्रभावी माध्यम बना।
रैंप का लोकार्पण—सिर्फ निर्माण नहीं, प्रशासन की पहुंच का सवाल
समाधान दिवस के दौरान मंडलायुक्त ने तहसील परिसर में वित्तीय वर्ष 2025-26 के अंतर्गत 8.97 लाख रुपये की लागत से नवनिर्मित रैंप का लोकार्पण भी किया।
दिव्यांगजनों के लिए रैंप का निर्माण एक बुनियादी सुविधा है, लेकिन इसका महत्व इससे कहीं व्यापक है।
सरकारी कार्यालय तक पहुंच ही यदि किसी नागरिक के लिए कठिन हो तो उसके अधिकारों और सेवाओं तक वास्तविक पहुंच भी प्रभावित होती है। ऐसे में तहसील परिसर में रैंप की सुविधा को सुगम और समावेशी प्रशासन की दिशा में एक व्यावहारिक कदम के रूप में देखा जा सकता है।
मंडलायुक्त ने भी स्पष्ट किया कि दिव्यांगजनों को शासकीय कार्यालयों में सुगम एवं सुविधाजनक आवागमन उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिकता है।
गार्ड ऑफ ऑनर से लेकर जनसुनवाई तक प्रशासनिक अमला रहा मौजूद
तहसील परिसर पहुंचने पर मंडलायुक्त संगीता सिंह को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। जनसुनवाई के दौरान जिलाधिकारी जसजीत कौर, पुलिस अधीक्षक केके बिश्नोई सहित पुलिस एवं प्रशासन के अधिकारी मौजूद रहे।
अधिकारियों की मौजूदगी में मंडलायुक्त ने जनसमस्याओं की सुनवाई करते हुए संबंधित विभागों को समयबद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए।
विश्लेषण: असली चुनौती अब 111 शिकायतों के बाद शुरू होती है
समाधान दिवस के आंकड़ों को केवल इस रूप में देखना कि 120 शिकायतें आईं और 9 का मौके पर समाधान हुआ, अधूरी तस्वीर होगी।
असल सवाल उन शिकायतों का है जिनके लिए आगे कार्रवाई जरूरी है।
विशेष रूप से 25 मामलों में संयुक्त टीमों को मौके पर भेजने का निर्देश बताता है कि प्रशासन जटिल मामलों में एकल विभागीय कार्रवाई के बजाय समन्वित जांच की जरूरत महसूस कर रहा है।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि इन टीमों की जांच कितनी तेजी से पूरी होती है और उसके बाद लिए गए निर्णय शिकायतकर्ता की समस्या को कितनी स्थायी रूप से समाप्त करते हैं।
यही वह बिंदु है जहां ‘शिकायत निस्तारण’ और ‘समस्या समाधान’ के बीच का फर्क सामने आता है।
आंकड़ों में समाधान दिवस
| बिंदु | स्थिति |
|---|---|
| कुल शिकायतें/प्रार्थना पत्र | 120 |
| मौके पर निस्तारित | 9 |
| संयुक्त टीमों से जांच वाले मामले | 25 |
| दिव्यांग रैंप की लागत | ₹8.97 लाख |
| प्रशासन का मुख्य जोर | गुणवत्तापरक एवं समयबद्ध समाधान |
अब असली कसौटी—फरियादी के चेहरे पर संतुष्टि
चांदपुर का यह समाधान दिवस प्रशासन के लिए एक स्पष्ट संदेश छोड़ गया है—शिकायत बंद करना और शिकायत खत्म करना एक ही बात नहीं है।
मंडलायुक्त द्वारा स्थलीय परीक्षण, संयुक्त टीमों और शिकायतकर्ता की संतुष्टि पर जोर इसी अंतर को पाटने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
अब प्रशासनिक व्यवस्था की अगली परीक्षा यही होगी कि समाधान दिवस में दर्ज शिकायतें फाइलों से निकलकर जमीन पर समाधान में कितनी बदलती हैं।
TargetTvLive की नजर में यही किसी भी समाधान दिवस की वास्तविक सफलता का सबसे बड़ा पैमाना है।












