बिजनौर के गांवों में अब किताबों से तय होगा भविष्य, CDO के औचक निरीक्षण से मचा हड़कंप
बिजनौर। जिले में विकास की परिभाषा अब सिर्फ सड़क और नाली तक सीमित नहीं रही। मुख्य विकास अधिकारी (CDO) रणविजय सिंह ने सोमवार को यह साफ कर दिया कि असली विकास गांव के बच्चों की शिक्षा से होगा। वह अचानक जिले की दो महत्वपूर्ण डिजिटल लाइब्रेरियों – रशीदपुर गढ़ी और तैमूरपुर दीपा का औचक निरीक्षण करने पहुंच गए।
TargetTvLive की इस ग्राउंड रिपोर्ट में समझिए क्यों यह दौरा महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ा संदेश है।
अवनीश त्यागी की रिपोर्ट
कुर्सी से नहीं, जमीन से लिया फीडबैक
आमतौर पर अधिकारी फाइलों में व्यवस्थाएं देखते हैं, लेकिन CDO रणविजय सिंह ने सीधा तरीका अपनाया। वह लाइब्रेरी में कुर्सी पर नहीं बैठे, बल्कि जमीन पर बैठकर पढ़ रहे छात्रों के बीच जाकर बैठ गए। उन्होंने बच्चों से पूछा – कौन सी किताब पढ़ रहे हो? प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कैसी चल रही है? क्या वाई-फाई और कंप्यूटर चल रहे हैं?
इस दौरान जो तस्वीर सामने आई वह सुखद थी। कर्मचारियों ने बताया कि दोनों लाइब्रेरियां अपने निर्धारित समय पर रोजाना खुल रही हैं।
रशीदपुर गढ़ी डिजिटल लाइब्रेरी में 25 बच्चे और तैमूरपुर दीपा लाइब्रेरी में 14 बच्चे रोजाना आकर सेल्फ स्टडी, बोर्ड परीक्षा और SSC, पुलिस, ग्रुप-D जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।
विश्लेषण: क्यों अटकी थी छात्रों की रफ्तार?
निरीक्षण के दौरान CDO ने एक छोटी लेकिन बड़ी समस्या पकड़ी। लाइब्रेरियों में किताबें तो थीं, लेकिन उन्हें ढूंढने में छात्रों का घंटों समय बर्बाद हो रहा था। किसी छात्र को इतिहास की किताब चाहिए तो उसे 3 अलमारी खंगालनी पड़ रही थी।
इसी को खत्म करने के लिए CDO ने एक नया और प्रैक्टिकल मॉडल दिया है।
CDO के दो बड़े निर्देश जो बदलेंगे सूरत:
1. विषयवार अलमारी सिस्टम: अब सभी पुस्तकों को उपन्यास, इतिहास, विज्ञान, प्रतियोगी परीक्षा के हिसाब से अलग-अलग अलमारियों में सजाया जाएगा।
2. अलमारी के बाहर इंडेक्स लिस्ट: हर अलमारी के बाहर उसमें रखी सभी 50-60 पुस्तकों की पूरी लिस्ट नाम और लेखक के साथ चस्पा की जाएगी। छात्र बाहर से ही देखकर अपनी किताब की लोकेशन पता कर लेगा।
CDO का कड़ा संदेश
निरीक्षण के अंत में CDO रणविजय सिंह ने संबंधित अधिकारियों को दो टूक कहा – “डिजिटल लाइब्रेरी कोई स्टोर रूम नहीं है। यह गांव के उन बच्चों के सपनों का केंद्र है जिनके पास शहर जाकर महंगी कोचिंग करने के पैसे नहीं हैं। यहां साफ-सफाई, शांत वातावरण और किताबों की सुगमता सबसे जरूरी है।”
उन्होंने कहा कि बच्चों की शिक्षा और उनकी नियमित उपस्थिति योगी सरकार की टॉप प्रायोरिटी में है और इसमें किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
निष्कर्ष: बिजनौर प्रशासन का यह कदम साफ दिखाता है कि अब फोकस सिर्फ लाइब्रेरी बना देने पर नहीं, बल्कि उसे चलाने और बच्चों से जोड़ने पर है। अगर यह मॉडल सभी लाइब्रेरियों में लागू हुआ तो बिजनौर के गांवों से भी अफसर और डॉक्टर निकलेंगे।
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