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“CM के आदेश बनाम अधिकारियों का दावा! बिजनौर में KGBV स्टाफ रोटेशन पर बड़ा खुलासा”

“CM के आदेश बनाम अधिकारियों का दावा! बिजनौर में KGBV स्टाफ रोटेशन पर बड़ा खुलासा, BSA बोले- कोई शासनादेश नहीं, आज तक नहीं हुआ एक भी स्थानांतरण”

मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक में तीन वर्ष में अनिवार्य रोटेशन के दिए गए थे निर्देश, लेकिन बिजनौर के अधिकारियों का दावा- स्थानांतरण संबंधी कोई शासनादेश नहीं मिला। आखिर सच क्या है?

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मुख्यमंत्री के निर्देशों को लेकर बिजनौर में बड़ा विरोधाभास! एक तरफ रोटेशन के आदेश, दूसरी तरफ अधिकारी बोले- आज तक नहीं हुआ कोई स्थानांतरण

रिपोर्ट : अवनीश त्यागी | TargetTvLive

बिजनौर। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) में कार्यरत स्टाफ के तीन वर्षीय अनिवार्य रोटेशन को लेकर बिजनौर जनपद में एक बड़ा प्रशासनिक विरोधाभास सामने आया है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित बेसिक शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक दिनांक 09 दिसंबर 2025 में स्पष्ट रूप से निर्देश दिए गए थे कि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में कार्यरत समस्त संविदा स्टाफ का प्रत्येक तीन वर्ष में रोटेशन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही विद्यालयों में नियमित निरीक्षण और महिला विजिटर नियुक्त करने पर भी विचार करने के निर्देश दिए गए थे।

लेकिन जब TargetTvLive ने इस संबंध में बिजनौर के जिम्मेदार अधिकारियों से जानकारी प्राप्त की, तो जो जवाब मिला उसने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

BSA और जिला समन्वयक KGBV ने क्या कहा?

TargetTvLive से बातचीत में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) बिजनौर सचिन कसाना तथा जिला समन्वयक (KGBV) बिजनौर ने स्पष्ट रूप से कहा कि—

“कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों के लिए स्थानांतरण संबंधी कोई शासनादेश प्राप्त नहीं हुआ है। आज तक जनपद में किसी भी कर्मचारी का स्थानांतरण नहीं किया गया है।”

अधिकारियों के इस बयान ने पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है। यदि मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से निर्देश जारी किए गए थे, तो क्या वे संबंधित विभाग तक नहीं पहुंचे? अथवा निर्देशों के अनुपालन के लिए कोई पृथक शासनादेश जारी किया जाना अपेक्षित था? यदि ऐसा था, तो वह आज तक क्यों नहीं आया?

मुख्यमंत्री की बैठक में क्या दिए गए थे निर्देश?

मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित समीक्षा बैठक के कार्यवृत्त के अनुसार कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों के संबंध में निम्नलिखित निर्देश दिए गए थे—

1. तीन वर्ष में स्टाफ का अनिवार्य रोटेशन

  • सभी संविदा कर्मचारियों का प्रत्येक तीन वर्ष में रोटेशन सुनिश्चित किया जाए।

2. नियमित निरीक्षण की व्यवस्था

  • सभी विद्यालयों में नियमित विजिट और निरीक्षण कराया जाए।

3. महिला विजिटर की व्यवस्था

  • शिक्षा क्षेत्र की प्रतिष्ठित संस्थाओं की महिला पदाधिकारियों एवं सदस्यों को विजिटर के रूप में नामित करने पर विचार किया जाए।

आखिर कहां अटक गई व्यवस्था?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक के निर्देश और जनपद स्तर पर अधिकारियों के बयान में इतना बड़ा अंतर आखिर क्यों है?

संभावनाएं कई हो सकती हैं—

  • क्या समीक्षा बैठक के निर्देशों के अनुपालन के लिए अलग से शासनादेश जारी होना था?
  • क्या संबंधित विभाग द्वारा जनपदों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए?
  • क्या शासन स्तर से जारी निर्देश फाइलों तक सीमित रह गए?
  • क्या जनपद स्तर पर अनुपालन को लेकर कभी समीक्षा ही नहीं हुई?

इन सवालों के जवाब मिलने अभी बाकी हैं।

बिजनौर में आज तक नहीं हुआ एक भी स्थानांतरण

यदि अधिकारियों के बयान को आधार माना जाए तो बिजनौर जनपद के किसी भी कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में आज तक एक भी कर्मचारी का स्थानांतरण नहीं किया गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि वर्षों से एक ही विद्यालय में कार्यरत कर्मचारी बिना किसी रोटेशन व्यवस्था के अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

जबकि मुख्यमंत्री कार्यालय का उद्देश्य स्पष्ट रूप से प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और छात्राओं के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।

नियमित निरीक्षण और विजिटर व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल

स्टाफ रोटेशन के साथ-साथ मुख्यमंत्री कार्यालय ने विद्यालयों में नियमित निरीक्षण तथा महिला विजिटर नियुक्त करने पर भी विचार करने के निर्देश दिए थे। लेकिन जनपद स्तर पर इन व्यवस्थाओं की स्थिति क्या है, इसे लेकर भी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

यदि इन व्यवस्थाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता तो—

  • विद्यालयों की स्वतंत्र निगरानी संभव होती।
  • छात्राओं की सुरक्षा व्यवस्था और अधिक मजबूत होती।
  • प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ती।
  • शिकायतों के निस्तारण की प्रक्रिया बेहतर होती।

TargetTvLive Investigation : आखिर सच क्या है?

अब इस पूरे मामले में तीन महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं—

पहला तथ्य

मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक के कार्यवृत्त में तीन वर्षीय स्टाफ रोटेशन का स्पष्ट उल्लेख है।

दूसरा तथ्य

बिजनौर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी और जिला समन्वयक KGBV का कहना है कि स्थानांतरण संबंधी कोई शासनादेश नहीं है।

तीसरा तथ्य

बिजनौर में आज तक किसी भी कर्मचारी का स्थानांतरण नहीं किया गया है।

इन तीन तथ्यों के बीच का विरोधाभास ही इस समाचार का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

शासन से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न

  • मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देशों के अनुपालन के लिए क्या अलग से शासनादेश जारी किया गया था?
  • यदि जारी हुआ था तो क्या वह जनपद तक पहुंचा?
  • यदि जारी नहीं हुआ तो जिम्मेदारी किसकी है?
  • बिजनौर में वर्षों से रोटेशन व्यवस्था लागू क्यों नहीं हुई?
  • नियमित निरीक्षण और महिला विजिटर व्यवस्था की वर्तमान स्थिति क्या है?
  • क्या शासन इस विषय पर कोई विशेष जांच अथवा समीक्षा करेगा?

निष्कर्ष

यह समाचार किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि शासन के निर्देशों और उनके जमीनी क्रियान्वयन के बीच मौजूद अंतर को सामने लाने का प्रयास है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में लिए गए निर्णयों का उद्देश्य छात्राओं के हितों की रक्षा, पारदर्शिता और बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था सुनिश्चित करना था। यदि संबंधित अधिकारी यह कहते हैं कि स्थानांतरण संबंधी कोई शासनादेश ही नहीं है और आज तक एक भी स्थानांतरण नहीं हुआ, तो यह विषय गंभीर प्रशासनिक समीक्षा की मांग करता है।

अब प्रदेश सरकार और बेसिक शिक्षा विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देशों का वास्तविक स्वरूप क्या है और उनका अनुपालन कब एवं किस प्रकार सुनिश्चित किया जाएगा।

रिपोर्ट : अवनीश त्यागी
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