किसानों का संघर्ष : अधिकारों के हनन पर उठते सवाल

नई दिल्ली | देशभर के किसान एक बार फिर अपने अधिकारों और न्याय की मांग को लेकर आक्रोशित हैं। पिछले 13 महीनों से दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे शांतिपूर्ण किसान आंदोलन को लेकर हाल ही में सरकार और किसान संगठनों के बीच वार्ता विफल हो गई। वार्ता विफल होने के बाद जब किसान अपने मोर्चों पर लौट रहे थे, तो पंजाब सरकार द्वारा कई किसान नेताओं की गिरफ्तारी और आंदोलनकारियों को हटाने की घटनाएं सामने आईं। इस कार्रवाई ने किसानों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है।
क्या है पूरा मामला?
किसान संगठनों की प्रमुख मांगों में फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी का कानून बनाना शामिल है। सरकार से लगातार वार्ता के बावजूद इस मुद्दे पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, जिससे आंदोलन जारी रहा। पंजाब और हरियाणा के बॉर्डरों पर शांतिपूर्ण धरने पर बैठे किसान सरकार से अपनी मांगों को लेकर संवाद कर रहे थे। लेकिन 19 मार्च 2025 को अचानक कई किसान नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, और प्रशासन द्वारा आंदोलन को बलपूर्वक समाप्त कर दिया गया।
किसानों में नाराजगी क्यों?
यह मुद्दा केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे किसानों के लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन के रूप में देखा जा रहा है। संविधान द्वारा प्रदत्त राइट टू प्रोटेस्ट (विरोध करने का अधिकार) के तहत किसी भी नागरिक को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की स्वतंत्रता दी गई है। ऐसे में किसानों का यह आरोप कि सरकार तानाशाही रवैया अपना रही है, लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
क्या कह रही है किसान यूनियन?
भारतीय किसान यूनियन (BKU) और अन्य किसान संगठनों ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। बिजनौर जिले के बीकेयू अध्यक्ष चौधरी सत्यवीर सिंह (सोनू चौधरी) ने महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक पत्र भेजकर इस मामले में न्याय की मांग की है। उन्होंने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि किसानों के साथ हुए अन्याय को संज्ञान में लिया जाए और उनके अधिकारों की रक्षा की जाए।
सरकार की चुप्पी पर सवाल
किसान आंदोलन के दौरान सरकार और विभिन्न संगठनों के बीच कई दौर की वार्ता हुई, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकला। अब जब किसानों की गिरफ्तारी और प्रदर्शनकारियों को हटाने की खबरें आई हैं, तो सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। इससे किसानों के गुस्से और अविश्वास को और बढ़ावा मिल रहा है।
आगे की राह क्या होगी?
अब सवाल यह है कि किसानों का यह आंदोलन किस दिशा में जाएगा? क्या सरकार उनके साथ दोबारा संवाद स्थापित करेगी, या फिर यह टकराव और गहराएगा? किसान संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपने अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगे। ऐसे में आने वाले दिनों में देश में किसान आंदोलन को लेकर एक नई रणनीति और संभावित विरोध प्रदर्शन देखने को मिल सकते हैं।
देश के अन्नदाताओं की यह लड़ाई सिर्फ MSP तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन का भी मामला बन गया है। अगर सरकार और किसान संगठनों के बीच भरोसे की कमी बनी रहती है, तो यह मुद्दा और जटिल हो सकता है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस मामले पर क्या रुख अपनाती है और क्या किसानों को न्याय मिल पाएगा?












