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बिजनौर में औषधि निरीक्षक की मनमानी: सरकार के निर्देशों को ठेंगा, मरीजों की जेब पर डाका

बिजनौर में औषधि निरीक्षक की मनमानी: सरकार के निर्देशों को ठेंगा, मरीजों की जेब पर डाका

लखनऊ/बिजनौर। एक तरफ उत्तर प्रदेश सरकार मरीजों को मुनाफाखोरी से बचाने के लिए सख्त कदम उठा रही है, वहीं बिजनौर में सरकारी निर्देशों की खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं। अपर आयुक्त (प्रशासन) रेखा एस. चौहान के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, बिजनौर के औषधि निरीक्षक उमेश पर गंभीर लापरवाही और अस्पतालों से मिलीभगत के आरोप लग रहे हैं। मरीजों का कहना है कि अधिकारी ने अस्पतालों में चल रही अनियमितताओं पर आंखें मूंद रखी हैं, जिससे प्राइवेट अस्पताल और मेडिकल स्टोर्स धड़ल्ले से मुनाफा कमा रहे हैं और मरीजों को लूट रहे हैं।

सरकारी निर्देशों को नजरअंदाज करने वाला अफसर

21 अक्टूबर, 2024 को जारी शासनादेश में साफ-साफ कहा गया था कि सभी औषधि निरीक्षकों को अस्पतालों और नर्सिंग होम्स में संचालित मेडिकल स्टोर्स का औचक निरीक्षण करना होगा। इसके तहत यह सुनिश्चित किया जाना था कि:

  • दवाएं सिर्फ लाइसेंसशुदा फार्मासिस्ट की उपस्थिति में ही बेची जाएं।
  • अस्पताल स्टोर्स पर दवाएं निर्धारित अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से अधिक दाम पर न बेची जाएं।
  • मरीजों को जबरन महंगी दवाएं न दी जाएं, और वही दवाएं आसपास के मेडिकल स्टोर्स पर भी उपलब्ध हों।

लेकिन बिजनौर में ये सारी गाइडलाइंस सिर्फ कागजों में सीमित रह गईं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि औषधि निरीक्षक उमेश अस्पताल संचालकों से मिलीभगत करके निरीक्षण के नाम पर दिखावा कर रहे हैं। नतीजा? मरीजों को महंगी दवाएं खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है, और फार्मासिस्ट की गैरमौजूदगी में गैर-तकनीकी लोग दवाओं की बिक्री कर रहे हैं।

मरीजों की मजबूरी, अस्पतालों की मनमानी

बिजनौर के कई प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों को इलाज के नाम पर आर्थिक शोषण का शिकार बनाया जा रहा है। मरीजों के परिजनों ने शिकायत की है कि अस्पताल परिसर में स्थित मेडिकल स्टोर्स पर दवाएं ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 में निर्धारित दामों से कहीं ज्यादा महंगी बेची जा रही हैं। जब मरीज सस्ती दवा बाहर से खरीदने की कोशिश करते हैं, तो अस्पताल प्रबंधन उन्हें इलाज से वंचित करने की धमकी देता है।

जब इस मामले की शिकायत औषधि निरीक्षक उमेश से की गई, तो उन्होंने कार्रवाई करने के बजाय शिकायतकर्ताओं को नजरअंदाज कर दिया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकारी ने अस्पताल संचालकों से मिलीभगत कर रखी है, जिसके कारण वह कार्रवाई करने से बचते हैं।

फार्मासिस्ट की जगह गैर-तकनीकी स्टाफ?

शासनादेश के मुताबिक, मेडिकल स्टोर्स पर दवाओं की बिक्री सिर्फ पंजीकृत फार्मासिस्ट की उपस्थिति में ही की जा सकती है। लेकिन बिजनौर में कई अस्पतालों में बिना फार्मासिस्ट के दवाएं बेची जा रही हैं। गैर-तकनीकी कर्मचारी बिना किसी विशेषज्ञता के दवाओं की डोज, एक्सपायरी और इंटरैक्शन की जानकारी के बिना मरीजों को दवा थमा रहे हैं। यह न सिर्फ कानून का उल्लंघन है, बल्कि मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ भी है।

जनता में आक्रोश, शासन से मांग उठी

बिजनौर के लोगों में इस लापरवाही और भ्रष्टाचार को लेकर गहरा आक्रोश है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय संगठनों ने सरकार से मांग की है कि औषधि निरीक्षक उमेश के खिलाफ तत्काल विभागीय जांच की जाए और मरीजों को लूटने वाले अस्पतालों पर कड़ी कार्रवाई हो। लोगों का कहना है कि अगर जिम्मेदार अधिकारी ही नियमों की अनदेखी करेंगे, तो मरीजों के हितों की रक्षा कैसे होगी?

क्या सरकार उठाएगी ठोस कदम?

उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और मरीजों को सस्ती, गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराने के लिए जो मुहिम शुरू की है, बिजनौर की यह स्थिति उस पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। क्या शासन इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करेगा? क्या भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों पर कार्रवाई होगी? या फिर मरीजों की आवाज़ें इसी तरह दबा दी जाएंगी?

सरकार की मंशा साफ है — मुनाफाखोरी पर लगाम लगाना और मरीजों के अधिकारों की रक्षा करना। अब देखना होगा कि क्या यह मंशा बिजनौर के जमीनी हालात में भी दिखेगी, या फिर मरीजों की लूट-खसोट का यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा?

क्या मरीजों को मिलेगा इंसाफ, या सिस्टम की सड़ांध यूं ही जारी रहेगी?

 

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