पत्रकार राघवेंद्र वाजपेई की हत्या से पत्रकारों में ज्वालामुखी फूटा
48 घंटे में एक्शन नहीं तो सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई
बिजनौर/सीतापुर। उत्तर प्रदेश में सच की आवाज उठाना अब जानलेवा साबित हो रहा है। भ्रष्टाचार की परतें उधेड़ने वाले पत्रकार राघवेंद्र वाजपेई की सरेआम गोली मारकर हत्या के बाद प्रदेशभर के पत्रकारों में आक्रोश है। प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक जर्नलिस्ट एसोसिएशन, श्रमजीवी पत्रकार यूनियन और Target TV Live के मुख्य संपादक अवनीश त्यागी समेत कई पत्रकार संगठनों ने सरकार को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। पत्रकारों ने साफ कहा है — अगर हत्यारे पकड़े नहीं गए और पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिला, तो राजधानी लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया जाएगा।
खाकी-खादी गठजोड़ के साए में हुई हत्या?
सूत्रों के मुताबिक, राघवेंद्र वाजपेई ने तहसील के बड़े भ्रष्टाचार की पोल खोलने के लिए आरटीआई दाखिल की थी, जिससे कई अफसरों की कुर्सी हिलने वाली थी। हत्या से ठीक पहले तहसीलदार ने राघवेंद्र को अपने घर बुलाया, और लौटते वक्त बदमाशों ने उनकी बाइक को टक्कर मारकर सरेआम गोली मार दी। सवाल उठते हैं:
- क्या प्रशासन के अफसर अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं?
- राघवेंद्र को धमकियों के बावजूद सुरक्षा क्यों नहीं दी गई?
- क्या सच लिखने की सजा अब मौत है?
अवनीश त्यागी की सरकार से दो टूक — पत्रकार सुरक्षा कानून बनाओ, वरना आंदोलन झेलने को तैयार रहो
Target TV Live के मुख्य संपादक अवनीश त्यागी ने सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा, “अगर सरकार को सच में लोकतंत्र की चिंता है, तो सभी वास्तविक पत्रकारों — चाहे वो डिजिटल मीडिया से हों या प्रिंट से — उन्हें बिना भेदभाव के निशुल्क सुरक्षा बीमा दिया जाए। पत्रकारों की सुरक्षा की गारंटी अब सरकार की जिम्मेदारी है।”
उन्होंने मांग की कि सिर्फ वादे नहीं, ठोस कानून बने ताकि:
- पत्रकारों पर हमला गैर-जमानती अपराध घोषित हो।
- सभी पत्रकारों को सरकार द्वारा 50 लाख का सुरक्षा बीमा दिया जाए।
- भ्रष्ट अधिकारियों और अपराधियों की मिलीभगत की तुरंत जांच हो।
पत्रकारों का अल्टीमेटम — या न्याय, या जनआंदोलन
प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक जर्नलिस्ट एसोसिएशन और श्रमजीवी पत्रकार यूनियन ने 48 घंटे की डेडलाइन देते हुए ऐलान किया:
- हत्यारों की गिरफ्तारी न हुई, तो प्रदेशभर में उग्र प्रदर्शन होगा।
- शहीद पत्रकार के परिजनों को 10 करोड़ मुआवजा और सरकारी नौकरी दी जाए।
- पत्रकार सुरक्षा कानून लागू न होने पर विधानसभा का घेराव किया जाएगा।
राष्ट्रीय अध्यक्ष गिरीश चंद्र कुशवाहा ने चेतावनी दी, “अगर सरकार चुप रही, तो हम कफन पहनकर लखनऊ की सड़कों पर उतरेंगे। सत्ता को झकझोरने के लिए धरना, प्रदर्शन, और अनशन जैसे हर कदम उठाए जाएंगे।”
अब आर-पार की लड़ाई तय — सरकार को लेना होगा फैसला
बैठक में ज्योतिलाल शर्मा, आलोक भारद्वाज, डॉ. सत्येंद्र शर्मा अंगिरस, अनिल खन्ना, नवीन गर्ग, मनोज बाल्मीकि, संजीव भुइयार और अनुराग शर्मा समेत सैकड़ों पत्रकारों ने भाग लिया। सभी ने एक स्वर में कहा:
“अगर पत्रकारों को इंसाफ नहीं मिला, तो ये लड़ाई सिर्फ राघवेंद्र की नहीं रहेगी — ये लड़ाई लोकतंत्र की होगी।”
अब पूरा प्रदेश देख रहा है — क्या योगी सरकार सचमुच पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कदम उठाएगी, या फिर पत्रकारों की कलम से निकलने वाली आग सत्ता की नींव को हिला देगी?
अब फैसला सरकार को करना है — न्याय या जनआक्रोश?










