उत्तर प्रदेश में बिजली निजीकरण के खिलाफ 79वें दिन भी जारी विरोध प्रदर्शन

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में बिजली के निजीकरण के खिलाफ विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के नेतृत्व में प्रदेशव्यापी विरोध प्रदर्शन लगातार 79वें दिन भी जारी रहा। संघर्ष समिति ने बिजली उपभोक्ताओं और कर्मचारियों के हितों को देखते हुए निजीकरण की प्रक्रिया को तत्काल निरस्त करने की मांग की है।
संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण से हजारों पद समाप्त हो जाएंगे। इसमें मुख्य अभियंता, अधिशासी अभियंता, सहायक अभियंता, जूनियर इंजीनियर और तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों के कुल 27,464 स्थायी पदों के साथ-साथ 50,000 संविदा कर्मियों की नौकरियां भी खतरे में पड़ जाएंगी। इससे अभियंताओं और जूनियर इंजीनियरों की पदावनति और छंटनी की गंभीर आशंका है।
संघर्ष समिति ने कहा कि निजीकरण से किसानों और गरीब उपभोक्ताओं को भारी नुकसान होगा। निजी कंपनियां किसानों को मुफ्त बिजली नहीं देंगी, जिससे ट्यूबवेल चलाने पर 12-15 हजार रुपये प्रति माह तक का बिजली बिल देना पड़ेगा। इसके अलावा, गरीबी रेखा से नीचे के उपभोक्ताओं की सब्सिडी समाप्त हो जाएगी। समिति ने मुंबई का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां निजीकरण के चलते घरेलू बिजली की दरें 17-18 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच गई हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में अभी यह अधिकतम 6.50 रुपये प्रति यूनिट है। निजीकरण के बाद बिजली दरों में तीन गुना तक वृद्धि की संभावना जताई जा रही है, जो आम जनता के लिए घातक साबित होगा।
आज प्रदेश के कई जिलों में जोरदार विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, गोरखपुर, मिर्जापुर, आजमगढ़, बस्ती, अलीगढ़, मथुरा, एटा, झांसी, बांदा, बरेली, देवीपाटन, अयोध्या, सुल्तानपुर, हरदुआगंज, पारीछा, ओबरा, पिपरी और अनपरा प्रमुख रहे।
संघर्ष समिति ने सरकार से अपील की है कि वह बिजली निजीकरण की प्रक्रिया को तत्काल रोके, अन्यथा आंदोलन को और तेज किया जाएगा।












