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खाकी से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक न्याय की भीख मांग रही पीड़िता

​“विकास भवन के बाबू का 7 साल का काला चिट्ठा: शादी का झांसा, जबरन गर्भपात… बचाने में जुटीं DDO रचना गुप्ता? 3 हफ्ते बाद भी नहीं मिला इंसाफ!”

मुख्य बिंदु

  • विकास भवन के वरिष्ठ सहायक पर 7 साल के दैहिक शोषण का काला सच
  • न थाने से राहत, न काउंसलिंग सेंटर से इंसाफ.
  • DDO दफ्तर में आरोपी के से आमना-सामना कराकर पीड़िता के जख्मों पर छिड़का जा रहा नमक!
रिपोर्ट : अवनीश त्यागी : TargetTvLive 

बिजनौर। “साहब! सात साल तक मेरी जिंदगी के साथ खिलवाड़ किया गया, झूठे वादों के जाल में फंसाकर मेरा शारीरिक शोषण किया गया और जब विरोध किया तो जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं… क्या सरकारी महकमों में बैठे रसूखदारों के लिए कानून के मायने बदल जाते हैं?”— यह दर्दभरी दास्तान है उस पीड़िता की, जो न्याय की आस में पिछले तीन हफ्तों से अधिक समय से पुलिस से लेकर प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है। मामला विकास भवन के एक वरिष्ठ सहायक से जुड़ा है, जहाँ खाकी और प्रशासन की सुस्त कार्यशैली पर अब बहुत बड़े और गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।

क्या है पूरा सनसनीखेज मामला?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पीड़िता ने कुछ समय पूर्व जिला मजिस्ट्रेट (DM) को एक विस्तृत प्रार्थना पत्र देकर न्याय की गुहार लगाई थी। शिकायती पत्र में आरोप लगाया गया है कि विकास भवन में वरिष्ठ सहायक के पद पर कार्यरत राजकुमार (पुत्र जयप्रकाश) से उसकी मुलाकात करीब सात साल पहले हुई थी। आरोपी ने उसे अपने मायाजाल में फंसाया, शादी का झांसा दिया और बिजनौर में किराए का मकान दिलवाकर लगातार उसका शारीरिक शोषण करता रहा।
हद तो तब पार हो गई जब पीड़िता के गर्भवती होने पर आरोपी ने बार-बार दवाइयां खिलाकर उसका जबरन गर्भपात करवा दिया। पीड़िता को जब इस बात का सच पता चला कि आरोपी पहले से ही शादीशुदा है और उसके बच्चे भी हैं, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। इसके बाद जब उसने आरोपी से अपने हक और शादी की बात कही, तो उसने साफ इनकार कर दिया और ऑफिस जाकर हंगामा करने पर गंदी गालियां देते हुए जान से मारने और झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी दी।

गंभीर अपराध को ‘पारिवारिक विवाद’ बताने का भद्दा खेल

इस पूरे प्रकरण में पुलिस और प्रशासनिक तंत्र का रवैया बेहद संदेहास्पद रहा है। कानूनविदों का कहना है कि जब यह मामला पूरी तरह से छल, धोखाधड़ी और जबरन गर्भपात जैसे गैर-जमानती संगीन अपराधों के दायरे में आता है, तो आखिर पुलिस ने शुरुआत में इसे ‘परिवार परामर्श केंद्र’ क्यों भेज दिया? क्या एक आरोपी सरकारी कर्मचारी को बचाने के लिए ऐसे गंभीर मामलों को आपसी पारिवारिक विवाद का जामा पहनाने की सोची-समझी साजिश रची जा रही है? परिवार परामर्श केंद्र और वन स्टॉप सेंटर की औपचारिकताओं के चक्रव्यूह में पीड़िता को उलझाकर रख दिया गया, ताकि मामले की गंभीरता स्वतः ही कमजोर पड़ जाए।

DDO दफ्तर में पूछताछ और आमना-सामना: न्याय है या मानसिक प्रताड़ना?

मामले ने जब तूल पकड़ा तो फाइल जिला विकास अधिकारी (DDO) कार्यालय पहुँची। लेकिन यहाँ न्याय मिलने के बजाय पीड़िता को कथित रूप से और अधिक मानसिक यंत्रणा से गुजरना पड़ा। विभागीय जांच के नाम पर पीड़िता को कार्यालय में घंटों बिठाकर लंबी पूछताछ की गई और हद तो तब हो गई जब प्रशासनिक जांच के नाम पर आरोपी वरिष्ठ सहायक और पीड़िता का आमना-सामना कराया गया। पीड़िता के शुभचिंतकों और कानूनी जानकारों का आरोप है कि DDO रचना गुप्ता के कार्यालय स्तर पर अपने इस चहेते कर्मचारी को बचाने के लिए लीपापोती की जा रही है, ताकि महकमे की किरकिरी न हो सके।

सुलगते सवाल जो सिस्टम को कटघरे में खड़े करते हैं:

* तीन सप्ताह बीत जाने के बाद भी मुख्य आरोपी वरिष्ठ सहायक राजकुमार पर अब तक एफआईआर दर्ज कर उसकी गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई?
* एक आपराधिक और संगीन मामले को परिवार परामर्श केंद्र की कागजी खानापूर्ति में क्यों उलझाया गया?
* क्या DDO कार्यालय में आरोपी से पीड़िता का आमना-सामना कराना उसके मनोबल को तोड़ने और मामले को रफा-दफा करने का प्रयास नहीं है?

प्रशासनिक रुख

 इस पूरे मामले को लेकर जब सीडीओ रण विजय सिंह से बात की गई, तब उनका जबाव था कि इस सम्बन्ध में डीडीओ रचना गुप्ता द्धारा ही इस कार्रवाई अमल में लाई जाएगी चूंकि वही राजकुमार की नियुक्ति प्राधिकारी है। हालांकि, जमीनी स्तर पर धीमी कार्रवाई को लेकर आम जनता और महिला संगठनों में भारी रोष व्याप्त है।

इस संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल मामले की हर एक परत और प्रशासनिक गतिविधियों पर पैनी नजर बनाए हुए है। न्याय की इस लड़ाई में आगे क्या अपडेट आता है, TargetTvLive नजर लगातार बनी हुई है।)

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