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शिक्षा विभाग का ‘बड़ा खेल’: फर्जीवाड़ा, सिंडिकेट और ‘डिस्पैच रजिस्टर’ का पन्ना-पन्ना गवाह!

शिक्षा विभाग का ‘बड़ा खेल’: फर्जीवाड़ा, सिंडिकेट और ‘डिस्पैच रजिस्टर’ का पन्ना-पन्ना गवाह!

खास खबर: जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) कार्यालयों में आउटसोर्सिंग नियुक्तियों के नाम पर भ्रष्टाचार का खेल नया नहीं है, लेकिन जब इस खेल में पब्लिशर्स का सिंडिकेट, राजनीतिक आकाओं का रसूख और लाखों के लेन-देन की एंट्री हो जाए, तो मामला गंभीर हो जाता है। ताजा मामला जिला समन्वयक (DC) प्रशिक्षण के पद पर हुई विवादित नियुक्ति का है, जिसने विभागीय साख पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या है पूरा मामला?

सूत्रों के मुताबिक, BSA कार्यालय में आउटसोर्सिंग के माध्यम से ‘जिला समन्वयक प्रशिक्षण’ (DC Training) के महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी की गई। इस पद के लिए मुकुल नाम के व्यक्ति का चयन हुआ।

दावा है कि इस नियुक्ति की पटकथा BSA कार्यालय के ही एक बेहद करीबी और प्रभावशाली बाबू राकेश ने लिखी। सूत्रों के अनुसार, लाखों रुपये के संदिग्ध लेन-देन के बल पर मुकुल को इस कुर्सी तक पहुंचाया गया।

निरस्तीकरण से ‘राजीनामा’ तक का पर्दाफाश

जब इस कथित लेन-देन और नियुक्ति की भनक जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी सचिन कसाना को हुई, तो प्राथमिक स्तर पर कार्रवाई करते हुए उन्होंने इस नियुक्ति को निरस्त कर दिया। निरस्तीकरण की एक बड़ी वजह मुकुल के शैक्षणिक प्रमाण पत्रों में पाई गई गंभीर खामियां भी थीं।

लेकिन खेल यहीं खत्म नहीं हुआ:

  1. राजनीतिक दबाव: नियुक्ति निरस्त होते ही बाबू राकेश ने अपने सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक संरक्षकों को सक्रिय किया।
  2. अधिकारियों पर सिफारिश: जनपद स्तरीय शीर्ष अधिकारियों से लेकर विभागीय अफसरों तक फोन घनघनाने लगे।
  3. सैटलाइट डील: सूत्रों की मानें तो राजनीतिक संरक्षण और पर्दे के पीछे हुई ‘हिस्सेदारी’ की टेबल-डील के बाद निरस्त नियुक्ति को रातों-रात पुनर्जीवित कर दिया गया।

बुक सप्लायर की कुर्सी पर ‘दूसरा’ बुक सप्लायर!

मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ यह है कि जिस मुकुल को शिक्षा तंत्र में ‘प्रशिक्षण समन्वयक’ जैसी शैक्षणिक जिम्मेदारी दी गई है, वह असल में एक बुक सप्लायर बताया जा रहा है।

विभागीय गलियारों में चर्चा है कि इस पूरी सांठगांठ की परतें तब उधड़नी शुरू हुईं जब प्रतिस्पर्धा में शामिल एक अन्य बुक सप्लायर के हितों को ठेस पहुंची। शैक्षणिक दस्तावेजों में गड़बड़ी की शिकायतें भी इसी अंदरूनी खींचतान का नतीजा मानी जा रही हैं।

‘डिस्पैच रजिस्टर’ खोल रहा है कई राज

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा पुख्ता दस्तावेज कार्यालई ‘डिस्पैच रजिस्टर’ बताया जा रहा है। निरस्तीकरण के आदेश जारी होने, फाइलों के आगे-पीछे होने और दबाव के बाद जारी पुनर्गठन पत्रों की तारीखें डिस्पैच रजिस्टर में दर्ज हैं, जो इस पूरे सिंडिकेट की पोल खोलने के लिए काफी हैं।

सवाल बड़ा है: जब शैक्षणिक दस्तावेजों में खामियों के आधार पर नियुक्ति निरस्त हुई थी, तो किस नियम के तहत उसे दोबारा मान्य किया गया? क्या डिस्पैच रजिस्टर की निष्पक्ष जांच होगी या राजनीतिक दबाव में इस फाइल को भी दबा दिया जाएगा?

रिपोर्ट: अवनीश त्यागी (एक्सक्लूसिव कवरेज – TargetTvLive)

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