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पत्रकार कौन, प्रचारक कौन? पत्रकारिता की असली कसौटी खेमेबंदी नहीं, तथ्य और सवाल हैं

पत्रकार कौन, प्रचारक कौन?

पत्रकारिता की असली कसौटी खेमेबंदी नहीं, तथ्य और सवाल हैं

डॉ. प्रियंका सौरभ

सूचना के विस्फोट के दौर में पत्रकार और प्रचारक के बीच अंतर करना कठिन होता जा रहा है। समाचार माध्यमों और डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़ती संख्या ने अभिव्यक्ति के अवसर बढ़ाए हैं, लेकिन इसी के साथ पत्रकारिता की विश्वसनीयता का प्रश्न भी अधिक महत्वपूर्ण हुआ है।

पत्रकारिता का मूल दायित्व किसी सत्ता या दल का समर्थन अथवा विरोध करना नहीं, बल्कि जनता के सामने प्रमाणित तथ्य रखना और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।

सरकार कोई निर्णय ले तो सवाल होना चाहिए—उसका आधार क्या है, उद्देश्य क्या है, सार्वजनिक संसाधनों पर उसका प्रभाव कितना है और परिणाम क्या रहे? विपक्ष कोई आरोप लगाए तो उसकी प्रमाणिकता, दस्तावेज और वैकल्पिक प्रस्ताव भी जांचे जाने चाहिए।

यानी कसौटी व्यक्ति या दल नहीं, तथ्य होना चाहिए।

पत्रकार और प्रचारक में अंतर

प्रचार का लक्ष्य किसी व्यक्ति, विचार या व्यवस्था के पक्ष में जनमत बनाना होता है। पत्रकारिता नागरिक को ऐसी विश्वसनीय सूचना देने का प्रयास करती है जिससे वह स्वयं निष्कर्ष निकाल सके।

पत्रकार स्रोत की जांच करता है, दावों का सत्यापन करता है, संदर्भ देखता है और संबंधित पक्ष का पक्ष जानने का प्रयास करता है। यदि कोई तथ्य उसकी अपनी धारणा के विपरीत हो, तब भी उसे सामने रखना उसकी जिम्मेदारी है।

पत्रकार तथ्य से निष्कर्ष तक पहुंचता है; प्रचारक अक्सर निष्कर्ष के समर्थन में तथ्य तलाशता है।

यहीं दोनों के बीच मूल अंतर है।

सवाल भी प्रमाण पर आधारित होना चाहिए

सिर्फ सवाल पूछ लेना पत्रकारिता नहीं है। सवाल का आधार, संदर्भ और प्रमाण भी महत्वपूर्ण हैं।

बिना पुष्टि के आरोप को खबर की तरह प्रस्तुत करना और बिना जांचे सरकारी दावे को तथ्य मान लेना—दोनों पत्रकारिता की विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं।

पत्रकार का दायित्व है कि वह दावे और तथ्य के बीच अंतर स्पष्ट करे।

निष्पक्षता का अर्थ बराबरी नहीं

निष्पक्षता का मतलब यह नहीं कि प्रमाणित तथ्य और अप्रमाणित दावा बराबर महत्व पाएं।

यदि किसी पक्ष के पास दस्तावेजी प्रमाण हैं और दूसरे के पास केवल आरोप, तो दोनों को समान सत्य के रूप में प्रस्तुत करना संतुलन नहीं है। निष्पक्ष पत्रकारिता प्रमाणों का वजन पहचानती है।

इसी तरह गलती होना असामान्य नहीं, लेकिन गलती सामने आने पर उसे सुधारना आवश्यक है। अपनी रिपोर्टिंग की समीक्षा और आवश्यक सुधार पत्रकारिता की कमजोरी नहीं, उसकी विश्वसनीयता का प्रमाण हैं।

सबसे कठिन सवाल अपने पक्ष से

पत्रकारिता की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब तथ्य अपने पसंदीदा पक्ष के विरुद्ध खड़े हों।

जो सरकार से सवाल करता है, उसे विपक्ष के दावों की भी जांच करनी चाहिए। जो सरकारी उपलब्धियां सामने रखता है, उसे कमियों पर भी सवाल करने चाहिए।

एक पक्ष के लिए अलग और दूसरे के लिए अलग कसौटी—पत्रकारिता नहीं, खेमेबंदी है।

सोशल मीडिया ने इस चुनौती को और बढ़ाया है। लोग अक्सर वही सूचना पसंद करते हैं जो उनकी पूर्वधारणा की पुष्टि करे। लेकिन पत्रकारिता का काम पसंद की पुष्टि करना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर धारणा को तथ्यों के सामने परखना है।

पत्रकार का काम फैसला सुनाना नहीं

किसे वोट देना है या किसे सत्ता में रहना चाहिए, यह नागरिक का निर्णय है। पत्रकार का काम उसके लिए राजनीतिक फैसला करना नहीं, बल्कि निर्णय के लिए आवश्यक तथ्य उपलब्ध कराना है।

उसे बताना चाहिए कि सरकार ने क्या किया, उसका दावा किस आधार पर है और उसके परिणाम क्या रहे। उसे यह भी जांचना चाहिए कि विपक्ष क्या कह रहा है और उसके दावों का प्रमाण क्या है।

पत्रकार जनता का फैसला नहीं करता; वह जनता को फैसला करने योग्य सूचना देता है।

निष्कर्ष

पत्रकारिता की स्थायी कसौटी सरल है—तथ्य, प्रमाण, संदर्भ और जनहित।

जब निष्कर्ष पहले तय हो जाए और तथ्य बाद में तलाशे जाएं, तब पत्रकारिता सूचना से प्रचार की ओर बढ़ने लगती है।

इसलिए पत्रकार को हर खबर से पहले स्वयं से एक सवाल पूछना चाहिए—

“क्या मेरा निष्कर्ष तथ्य से निकला है, या मैंने तथ्य अपने निष्कर्ष के लिए चुने हैं?”

यही सवाल पत्रकार और प्रचारक के बीच सबसे स्पष्ट रेखा खींचता है।

पत्रकार की कलम न सत्ता की ढाल हो, न खेमे की तलवार—वह सच की धार हो; क्योंकि जिस दिन कलम खेमे के आगे झुकती है, उसी दिन पत्रकारिता अपनी धार खो देती है।

— डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक

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