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टैंक लगा नहीं, तेल पहुंच गया; फिर GPS के बावजूद ‘गायब’ कैसे हुआ टैंकर? जलालपुर कांड में जांच की नई कड़ी

31 अगस्त का टैंकर, 7 दिन का ठिकाना गायब! GPS लॉग खोलेगा जलालपुर पेट्रोल कांड का सबसे बड़ा राज

बिजनौर के जलालपुर में टैंक लगने से पहले पेट्रोलियम पहुंचा, टैंकर 7 दिन आबादी में खड़ा रहा। जिओ-टैग तस्वीरें मौजूद, लेकिन GPS ट्रैकिंग के बावजूद टैंकर ‘गायब’ कैसे? ARO के बयानों के विरोधाभास पर उठे सवाल

अवनीश त्यागी | TargetTvLive

बिजनौर (TargetTvLive)। जलालपुर पेट्रोलियम प्रकरण अब साधारण विभागीय चूक का मामला नहीं रहा। यह उस डिजिटल पहेली में बदल चुका है, जिसका जवाब कागजों में नहीं, टैंकर के GPS लॉग और जिओ-टैग तस्वीरों के मेटाडाटा में छिपा है।

31 अगस्त को पेट्रोल-डीजल से लदा टैंकर जलालपुर पहुंचा, जबकि प्रस्तावित आउटलेट का टैंक उस समय स्थापित ही नहीं था। आरोप है कि इसके बाद वह टैंकर करीब एक सप्ताह तक गांव की आबादी के बीच खड़ा रहा, खुली सड़क पर, भरे हुए पेट्रोलियम के साथ।

और अब सबसे बड़ा सवाल: जब टैंकर GPS से ट्रैक हो सकता था, तो वह ‘गायब’ कैसे हो गया?

जिओ-टैग फोटो बनाम GPS लॉग: दो डिजिटल गवाह, एक सच

इस मामले में जांच के पास दो अचूक डिजिटल गवाह हैं।

पहला गवाह: मौके की जिओ-टैग तस्वीरें, जिनके मेटाडाटा की स्वतंत्र जांच से फोटो के स्थान और समय की पुष्टि हो सकती है।

दूसरा गवाह: टैंकर का GPS/जियो-ट्रैकिंग रिकॉर्ड, जो 31 अगस्त से अगले कई दिनों तक टैंकर की पल-पल की लोकेशन बता सकता है।

यदि दोनों रिकॉर्ड मिलते हैं, तो घटनाक्रम साबित। यदि दोनों में अंतर मिलता है, तो वही अंतर जांच का सबसे बड़ा सुराग होगा। इसीलिए GPS हिस्ट्री, डिवाइस लॉग, ट्रैकिंग सर्वर रिकॉर्ड और तेल कंपनी के डिस्पैच रिकॉर्ड को तत्काल सुरक्षित कराया जाना चाहिए।

‘आपको कैसे पता लगा?’ से ‘मैं पहुंचा ही नहीं’ तक: ARO के बयान बने पहेली

टेलीफोन बातचीत में जब टैंकर के बारे में पूछा गया, तो ARO आशाराम का कथित पहला सवाल था: “आपको कैसे पता लगा?”

लोकेशन पूछने पर कथित जवाब: “मैं साइड पर हूं।” साथ ही यह भी कहा गया कि “आप समाचार बनाएं, तभी साइड पर आएं।”

लेकिन मौके पर पहुंचने पर ARO वहां मिले ही नहीं। बाद में फोन पर उन्होंने कथित तौर पर कहा: “मैं तो वहां पहुंचा ही नहीं”, और वह मेरठ-पौड़ी हाईवे पर इसी संबंध में जांच कर रहे हैं।

यहां सवाल तीखा हो जाता है: यदि अधिकारी मौके पर पहुंचे ही नहीं थे, तो “साइड पर” होने की बात किस संदर्भ में कही गई? और यदि वह हाईवे पर किसी अन्य स्थान पर टैंकर की जांच कर रहे थे, तो टैंकर की असली लोकेशन क्या थी, और विभागीय रिकॉर्ड क्या कहता है?

‘कल सुरक्षित, आज तलाश’: टैंकर गायब कैसे?

जिस टैंकर को पहले सुरक्षित स्थान पर खड़े होने की बात कही जा रही थी, बाद में उसी की तलाश की नौबत आ गई।

अगर लोकेशन विभाग को मालूम थी, तो क्या आबादी में खड़े होने की जानकारी भी थी? थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? नहीं थी, तो जियो-ट्रैकिंग, डिलीवरी रिकॉर्ड और तस्वीरों के बावजूद स्थिति स्पष्ट करने में दिक्कत क्यों आई?

टैंक नहीं था, तो पेट्रोलियम गया कहां?

यह इस पूरे कांड की सबसे विस्फोटक कड़ी है।

यदि निर्धारित टैंक स्थापित नहीं था, तो 31 अगस्त को पहुंचा हजारों लीटर पेट्रोलियम आखिर गया कहां? टैंकर में ही रहा, तो इतने दिन उसे किसके आदेश पर, किसकी जिम्मेदारी पर खड़ा रखा गया? उतारा गया, तो किस स्वीकृत भंडारण में? कहीं और भेजा गया, तो उसका रिकॉर्ड कहां है?

डिलीवरी चालान और वास्तविक अनलोडिंग रिकॉर्ड ही इस सवाल का जवाब देंगे।

जांच के 10 अहम बिंदु: GPS हिस्ट्री खोलेगी राज

निष्पक्ष जांच के लिए टैंकर की पूरी GPS हिस्ट्री हासिल करना सबसे सीधा रास्ता है:

31 अगस्त को टैंकर कहां से चला, कब जलालपुर पहुंचा?
कितने दिन, कितने घंटे कहां खड़ा रहा?
GPS डिवाइस सक्रिय थी या बंद?
सिग्नल में कोई असामान्य गैप आया?
टैंकर किसी दूसरे ठिकाने पर गया?
लोकेशन डिलीवरी चालान से मेल खाती है?
तेल कंपनी के डिस्पैच रिकॉर्ड में क्या दर्ज है?
ड्राइवर के बयान और GPS रिकॉर्ड में समानता है?

विभागीय निगरानी पर सवाल

जिला आपूर्ति अधिकारी से जब भरे टैंकर के सड़क किनारे खड़े रहने की अवधि पर सवाल पूछा गया, तो कथित जवाब मिला: “इस संबंध में मेरे पास अधिकार नहीं है।”

तो फिर सक्षम प्राधिकरण कौन है? सूचना मिलने के बाद विभाग की जिम्मेदारी क्या बनती है? अधिकार न होने का मतलब यह नहीं कि सूचना को दबा दिया जाए, कम से कम संबंधित प्राधिकरण को अवगत कराने की प्रक्रिया तो स्पष्ट होनी चाहिए।

 सवाल ‘टैंकर कहां है’ से आगे का है

जलालपुर कांड अब सिर्फ यह नहीं पूछ रहा कि टैंक लगने से पहले सप्लाई क्यों हुई। यह पूछ रहा है:

GPS क्या कहता है? फोटो क्या कहती है? चालान क्या कहता है? टैंक स्थापना का रिकॉर्ड क्या कहता है? और जांच रिपोर्ट क्या कहती है?

इन पांचों को आमने-सामने रखने पर ही सच सामने आएगा। फिलहाल उपलब्ध घटनाक्रम किसी की दोषसिद्धि का आधार नहीं, लेकिन दस्तावेज-आधारित, तकनीकी और निष्पक्ष जांच की ठोस वजह जरूर है।

             कहानी अभी शेष है

 

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