झालू में ‘होलिका दहन’ की जमीन पर कब्जे का आरोप बना बड़ा मुद्दा, “आस्था दबाने की कोशिश या कुछ और?”
रिपोर्ट: विशेष संवाददाता | बिजनौर
उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद के कस्बा झालू में सदियों पुरानी होलिका दहन स्थल की जमीन पर कथित कब्जे का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। मौहल्ला चौधरियान में आयोजित एक अहम बैठक के बाद नगरवासियों का आरोप है कि बैठक में दो अहम मुद्दे—होलिका दहन स्थल पर कब्जा और किन्नरों द्वारा कथित अवैध वसूली—दोनों उठाए गए थे, लेकिन समाचारों में केवल एक मुद्दे को ही प्रमुखता दी गई।
नगरवासियों का कहना है कि परंपरा और आस्था से जुड़े होलिका दहन स्थल के कब्जे के मुद्दे को नजरअंदाज करना कई सवाल खड़े करता है।
सदियों पुरानी परंपरा पर संकट, प्रशासन को दिया गया ज्ञापन
स्थानीय नागरिकों और विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े पदाधिकारियों ने उपजिलाधिकारी को दिए ज्ञापन में बताया कि:
- कस्बा झालू में मंदिर ठाकुरद्वारा के पीछे और आर्य समाज के सामने स्थित भूमि पर वर्षों से होलिका दहन होता आ रहा है
- आरोप है कि उक्त भूमि को पहले एक व्यक्ति द्वारा बेचा गया और बाद में कथित रूप से गलत तरीके से होलिका दहन स्थल को भी बैनामे में शामिल कर लिया गया
- नगर पंचायत को सूचना देने के बावजूद अभी तक जमीन खाली कराने की कोई कार्रवाई नहीं हुई
ज्ञापन में मांग की गई है कि होलिका दहन स्थल को तत्काल कब्जामुक्त कराकर कानूनी कार्रवाई की जाए।
विरोध में बड़ा फैसला: इस बार नहीं रखा गया बसंत
नगरवासियों के अनुसार, इस विवाद के चलते इस वर्ष परंपरागत बसंत कार्यक्रम नहीं रखा गया।
स्थानीय लोगों ने स्पष्ट कहा:
“जब तक होलिका दहन स्थल कब्जामुक्त नहीं होगा, तब तक होलिका दहन भी नहीं किया जाएगा।”
इस फैसले से साफ है कि मामला केवल जमीन का नहीं, बल्कि धार्मिक परंपरा और सामुदायिक आस्था का प्रतीक बन चुका है।
प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में प्रमुख रूप से
ज्ञानेश्वर सिंह (धर्म प्रसार सह प्रमुख, विश्व हिंदू परिषद, बिजनौर), प्रवीण सिंह, अनुज, उमंग सहित अन्य स्थानीय नागरिक शामिल हैं।
अब पूरे कस्बे की नजर प्रशासन के अगले कदम पर टिकी है। यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो यह विवाद और बड़ा जनआंदोलन बन सकता है।
ग्राउंड रियलिटी: क्यों संवेदनशील है मामला
- ✔️ सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा से जुड़ा स्थल
- ✔️ सामुदायिक आस्था का केंद्र
- ✔️ प्रशासनिक कार्रवाई में कथित देरी
- ✔️ मीडिया कवरेज को लेकर असंतोष
निष्कर्ष: आस्था, जमीन और विश्वास — तीनों दांव पर
झालू का यह विवाद अब सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और मीडिया की निष्पक्षता से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है।
यदि समय रहते समाधान नहीं निकला, तो इसका असर सामाजिक सौहार्द और स्थानीय परंपराओं पर पड़ सकता है।
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