मतदाता दिवस सिर्फ औपचारिकता नहीं, लोकतंत्र की असली कसौटी

कलेक्ट्रेट में शपथ, लेकिन सवाल ज़मीनी भागीदारी का
बिजनौर | 24 जनवरी 2026 | विशेष रिपोर्ट। अवनीश त्यागी
राष्ट्रीय मतदाता दिवस को लेकर बिजनौर कलेक्ट्रेट के महात्मा विदुर सभागार में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह औपचारिक कार्यक्रम भर नहीं रहा, बल्कि यह लोकतंत्र की मौजूदा सेहत पर सोचने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी बन गया। अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व श्रीमती वान्या सिंह की अध्यक्षता में हुए इस कार्यक्रम में अधिकारियों और कर्मचारियों ने निष्पक्ष, स्वतंत्र और निर्भीक मतदान की शपथ ली।
चूंकि 25 जनवरी रविवार का अवकाश है, इसलिए प्रशासन ने एक दिन पूर्व 24 जनवरी को ही कार्यक्रम आयोजित कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि लोकतांत्रिक परंपराएं तिथि की मोहताज नहीं होतीं, बल्कि निरंतर सजगता की मांग करती हैं।
शपथ के मायने: शब्दों से आगे की जिम्मेदारी
शपथ के शब्द स्पष्ट थे—धर्म, जाति, वर्ग, समुदाय, भाषा या किसी भी प्रकार के प्रलोभन से ऊपर उठकर मतदान। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह संकल्प केवल सभागार की चारदीवारी तक सीमित रहेगा या प्रशासनिक व्यवस्था इसे आम मतदाता तक प्रभावी रूप से पहुंचा पाएगी?
जिले में पिछले कुछ चुनावों में मतदान प्रतिशत में उतार-चढ़ाव और शहरी क्षेत्रों में बढ़ती राजनीतिक उदासीनता इस बात का संकेत देती है कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए शपथ से आगे जाकर ठोस प्रयास जरूरी हैं।
प्रशासनिक प्रतिबद्धता बनाम जमीनी हकीकत
कार्यक्रम में जिला सूचना अधिकारी हर्ष चावला, सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी प्रमोद कुमार सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे। उनकी उपस्थिति प्रशासनिक गंभीरता को दर्शाती है, लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब अंतिम पंक्ति का मतदाता बिना डर, दबाव और प्रलोभन के मतदान केंद्र तक पहुंचे।
मतदाता जागरूकता अभियान, फर्जी मतदाताओं की पहचान, युवा मतदाताओं की भागीदारी और सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाई जा रही भ्रामक सूचनाओं पर नियंत्रण—ये सभी चुनौतियां अभी भी प्रशासन के सामने जस की तस खड़ी हैं।
लोकतंत्र मजबूत होगा या रस्मी बनकर रह जाएगा ?
राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर ली गई शपथ तभी सार्थक होगी जब इसे प्रशासनिक फाइलों से निकालकर गांव, कस्बों और शहरी वार्डों तक ले जाया जाएगा। निष्पक्ष चुनाव केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि विश्वास निर्माण की प्रक्रिया है।
अगर प्रशासन इस शपथ को निरंतर अभियान में बदलता है, तो यह लोकतंत्र को मजबूती देगा। अन्यथा यह कार्यक्रम भी साल-दर-साल दोहराई जाने वाली एक रस्मी परंपरा बनकर रह जाएगा।
बिजनौर में आयोजित यह शपथ ग्रहण समारोह एक अवसर है—आत्ममंथन का भी और आत्मसुधार का भी। अब देखना यह है कि यह संकल्प मतपेटी तक कितना प्रभावी रूप से पहुंचता है।
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