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NHAI–वन विभाग की जंग या अवैध गतिविधियों को बचाने की साजिश ?

क्या सेंचुरी अब माफियाओं की जागीर बन चुकी है ?
NHAI–वन विभाग विवाद में ‘सेफ FIR’ का चौंकाने वाला सच

सेंचुरी में मिट्टी, पेड़ और करोड़ों के खेल में अफसर–माफिया गठजोड़ बेनकाब

विरोधी,अफसर को फंसाने की पटकथा, ‘सेफ FIR’ और सिस्टम की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल

सतह पर टकराव, भीतर सुनियोजित खेल ?

बिजनौर।

NHAI और वन विभाग के बीच हालिया टकराव को अगर सिर्फ एक “प्रशासनिक विवाद” माना जा रहा है, तो यह सच्चाई से आंख मूंदने जैसा होगा। ज़मीनी साक्ष्य, पुराने मुकदमे, FIR की बनावट और अंदरूनी सूत्रों के खुलासे यह संकेत दे रहे हैं कि यह मामला अवैध खनन, वन संपदा की लूट और अफसर–माफिया गठजोड़ से जुड़ा एक सुनियोजित खेल हो सकता है।

यह लड़ाई नहीं, बल्कि सच को दबाने की कोशिश प्रतीत होती है।

इतिहास गवाह है: सेंचुरी और इको ज़ोन में बार-बार कानून का उल्लंघन

सूत्रों के अनुसार, NHAI से जुड़े ठेकेदारों द्वारा वन्य जीव अभ्यारण्य (Sanctuary) और इको-सेंसिटिव ज़ोन में बिना पर्यावरणीय अनापत्ति के अवैध मिट्टी खनन और पेड़ों की अनियमित कटाई कोई नई बात नहीं है।

पूर्व में भी:

  • अवैध खनन के कई मुकदमे दर्ज हुए
  • वन एवं पर्यावरण अधिनियम की खुली अवहेलना हुई
  • मामूली जुर्माना लगाकर मामलों को निपटा दिया गया

विशेषज्ञों का कहना है कि यही “छोटी-मोटी कार्यवाहियां” दरअसल रेंजर–NHAI गठजोड़ का सबसे बड़ा सबूत हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि आखिर गंभीर अपराधों पर रेंजर आंख मूंदकर क्यों बैठा रहा?

रेंज अफसर–NHAI SDO गठजोड़ के सनसनीखेज आरोप

विश्वसनीय सूत्र इस पूरे घटनाक्रम की धुरी क्षेत्रीय वनाधिकारी (R.O.) महेश गौतम और NHAI के SDO आशीष शर्मा को मान रहे हैं।

आरोप बेहद गंभीर हैं:

  • वन्य जीव अभ्यारण्य की सैकड़ों बीघा भूमि को अवैध रूप से किराए पर देना
  • मोटी रकम लेकर खेती कराना
  • सेंचुरी क्षेत्र में अवैध मिट्टी खनन को खुला संरक्षण
  • खनन माफियाओं से सक्रिय मिलीभगत

सबसे चौंकाने वाली बात यह कि इन आरोपों के बावजूद अब तक कोई ठोस और निष्पक्ष कार्रवाई सामने नहीं आई।

DFO के आदेश बेअसर, ज़मीन पर माफिया हावी

सूत्र बताते हैं कि DFO स्तर से:

  • अवैध खेती हटाने
  • भूमि को कब्जा मुक्त कराने

के आदेश दिए गए थे, लेकिन:

  • आदेश कागज़ों तक सिमट गए
  • खेती आज भी जारी है
  • सेंचुरी में मिट्टी का अवैध कारोबार बदस्तूर चल रहा है

यह सवाल अब और तेज हो गया है—
क्या वन्य जीव अभ्यारण्य माफियाओं की निजी जागीर बन चुका है?

SDO ज्ञान सिंह बने बाधा, तभी रची गई ‘फंसाने’ की साजिश ?

मामले ने तब निर्णायक मोड़ लिया जब SDO ज्ञान सिंह ने अवैध मिट्टी खनन के खिलाफ सख्ती शुरू की।

सूत्रों का दावा है कि:

  • जैसे ही अवैध कारोबार पर खतरा बढ़ा
  • एक पूर्व-नियोजित साजिश रची गई
  • ताकि ईमानदार अधिकारी को कठघरे में खड़ा किया जा सके
  • और असली खेल खेलने वाले सुरक्षित रहें

यहीं से यह प्रकरण प्रशासनिक विवाद से निकलकर सुनियोजित षड्यंत्र का रूप ले लेता है।

FIR में ‘बड़े नाम’ गायब—संयोग या रणनीति ?

पूरे मामले का सबसे सनसनीखेज पहलू यह है कि:

  • क्षेत्रीय वनाधिकारी महेश गौतम का नाम FIR में दर्ज नहीं है
  • जबकि NHAI के कई कर्मचारी पूरे घटनाक्रम से भली-भांति परिचित बताए जाते हैं

कानूनी विशेषज्ञों की मानें तो:

  • FIR में नाम न होना कोई साधारण चूक नहीं
  • बल्कि यह एक “सेफ FIR” की रणनीति हो सकती है

अनूप कुमार गिरफ्तार, लेकिन FIR में नाम नहीं—क्यों ?

गौरतलब है कि:

  • वन संपदा और वन्य जीव अधिनियम की धाराओं में जेल भेजे गए इंजीनियर अनूप कुमार को रेंजर बिजनौर ने गिरफ्तार किया
  • लेकिन NHAI अधिकारियों द्वारा पुलिस को दी गई तहरीर में उनका नाम शामिल नहीं किया गया

यह तथ्य कई सवाल खड़े करता है—

  • क्या जानबूझकर कुछ नामों को बचाया गया?
  • क्या जांच को एक दिशा में मोड़ने की कोशिश हुई?

तहरीर की ‘साधारण भाषा’ और पुलिस की भूमिका पर भी सवाल

सूत्रों का दावा है कि:

  • FIR/तहरीर की भाषा असामान्य रूप से बेहद साधारण और सुरक्षित है
  • इसे कथित तौर पर पुलिस के एक बड़े अधिकारी की देखरेख में तैयार कराया गया

ताकि:

  • वन अधिकारियों पर दबाव बनाया जा सके
  • और पुलिस-प्रशासन-माफिया गठजोड़ निर्बाध चलता रहे

कानूनी पेच: हैंडओवर से पहले सरकारी काम कैसे ?

एक अहम कानूनी सवाल भी सामने आता है— जब तक किसी प्राइवेट ठेकेदार कंपनी द्वारा परियोजना का हैंडओवर NHAI को नहीं किया जाता, तब तक उस कार्य को सरकारी कैसे माना जा सकता है?

विशेषज्ञों का कहना है कि:

  • साजिश रचने वालों से यहीं बड़ी भूल हो गई
  • क्योंकि अपराधी कितना भी शातिर क्यों न हो,
    कोई न कोई गलती कर ही देता है।

यह टकराव नहीं, सिस्टम की सड़ांध है

यह मामला:

  • दो विभागों की लड़ाई नहीं
  • बल्कि उस तंत्र की पोल खोलता है
    जहां संरक्षण की आड़ में लूट होती है,
    ईमानदार अफसरों को फंसाया जाता है,
    और माफिया बेखौफ फलते-फूलते हैं।

यदि स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हुई, तो यह प्रकरण वन्य जीव संरक्षण के नाम पर हुए सबसे बड़े घोटालों में से एक साबित हो सकता है।

अब सवाल सिर्फ एक है—
सच सामने आएगा या यह फाइल भी ताकतवर नामों के नीचे दबा दी जाएगी?

डिस्क्लेमर 

इस रिपोर्ट में उल्लिखित सभी आरोप विभिन्न सूत्रों, दस्तावेज़ों एवं जानकारियों पर आधारित हैं। डिजिटल न्यूज पोर्टल निष्पक्ष पत्रकारिता के तहत सभी संबंधित पक्षों का पक्ष प्रकाशित करने के लिए तैयार है।

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