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SDO–PD NHAI–ठेकेदार गठजोड़ बेनकाब, अवैध खनन से लेकर वनकर्मियों पर जानलेवा हमले तक

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बारहसिंगा सेंचुरी पर संगठित हमला: SDO–PD NHAI–ठेकेदार गठजोड़ बेनकाब, अवैध खनन से लेकर वनकर्मियों पर जानलेवा हमले तक

हाईकोर्ट–NGT की सख्त नजर के बावजूद संरक्षित अभ्यारण्य में खुलेआम कानून की धज्जियां

अवनीश त्यागी की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट

बिजनौर | 20 जनवरी 2026 |

उत्तर प्रदेश के बिजनौर में स्थित राज्य पशु बारहसिंगा अभ्यारण्य अब केवल वन्यजीवों का आश्रय नहीं, बल्कि प्रशासनिक संरक्षण में फल-फूल रहे वन–खनन माफिया नेटवर्क का केंद्र बनता जा रहा है।
NH-119 परियोजना की आड़ में सामने आया यह प्रकरण अब स्थानीय नहीं रहा—बल्कि इसमें NHAI के मैदानी अधिकारी (SDO), उच्च अधिकारी (PD NHI मेरठ) और मिट्टी ठेकेदारों की संदिग्ध भूमिका ने इसे राष्ट्रीय स्तर का पर्यावरणीय अपराध बना दिया है।

BREAKING FACTS: जांच के दौरान रंगे हाथों पकड़ा गया अपराध

दिनांक 20.01.2026 को
सामाजिक वानिकी प्रभाग, बिजनौर की टीम—

  • उप प्रभागीय वनाधिकारी ज्ञान सिंह,
  • क्षेत्रीय वन अधिकारी महेश चंद गौतम,
  • वन दरोगा योगेंद्र,
    सहित अन्य वनकर्मी NH-119 परियोजना को मिली वन एवं वन्यजीव क्लियरेंस की शर्तों के अनुपालन की जांच कर रहे थे।

📍 जीवनपुरी के पास बारहसिंगा सेंचुरी क्षेत्र में

  • JCB मशीन से प्रतिबंधित प्रजाति के वृक्ष जड़ों सहित उखाड़े जा रहे थे,
  • मिट्टी सहित डंपर में भरकर अवैध अभिवहन किया जा रहा था।

आरोपी का कबूलनामा: “यह काम NHAI के SDO आशीष शर्मा के कहने पर हुआ”

मौके पर पकड़े गए आरोपी अनूप पुत्र प्रेमपाल (ग्राम कसेरी, कासगंज) ने स्पष्ट रूप से बयान दिया कि

“यह सारा कार्य NHAI के SDO आशीष शर्मा के निर्देश पर चोरी-छिपे कराया जा रहा है।”

आरोपी द्वारा SDO और अन्य NHAI कर्मियों से फोन पर बात कराई गई, जिसमें

  • वनकर्मियों के लिए अश्लील गालियाँ,
  • कुछ ही देर में 20–25 अज्ञात लोगों को मौके पर बुलाना,
  • जानलेवा हमला,
  • सरकारी कार्य में बलपूर्वक बाधा,
  • तथा वन विभाग की हिरासत से डंपर, वन उपज और चालक को जबरन छुड़ाकर फरार होना
    जैसी घटनाएं सामने आईं।

दर्ज हुआ संज्ञेय वन अपराध, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं

वन विभाग ने रेंज वन अपराध संख्या 72/बिजनौर/2025-26 के अंतर्गत गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है, जिनमें शामिल हैं:

  • भारतीय वन अधिनियम, 1927
  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972
  • वन संरक्षण अधिनियम, 1980
  • जैव विविधता अधिनियम, 2002

वन विभाग के अनुसार यह पूरी तरह संज्ञेय अपराध है।

EXPOSE: PD NHI मेरठ की बातचीत ने खोल दी पूरी परत

इस मामले में जब PD NHI मेरठ से बात की गई, तो उन्होंने पहले कहा—

“यह काम ठेकेदार का है।”

लेकिन जब यह स्पष्ट रूप से याद दिलाया गया कि
✔ मिट्टी उत्खनन की परमिशन,
✔ डंपर संचालन,
✔ और स्थल नियंत्रण
पूरी तरह SDO आशीष शर्मा की जिम्मेदारी होती है,
तो PD NHI ने जवाब देने के बजाय उल्टा सवाल किया—“कागज किसके होते हैं?”

👉 यह सवाल ही इस बात का स्वयं प्रमाण बन गया कि

  • PD NHI जानते हैं कि सारी फाइलें SDO के पास होती हैं,
  • SDO वेतन NHAI से लेते हैं,
  • लेकिन काम मिट्टी ठेकेदारों/माफिया के लिए करते हैं

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार,

“यह चुप्पी नहीं, बल्कि संस्थागत सहभागिता (Institutional Complicity) का संकेत है।”

पुराना रिकॉर्ड: पहले से दर्ज हैं कई वन अपराध

सूत्रों के अनुसार SDO आशीष शर्मा के विरुद्ध पहले भी

  • ईको सेंसिटिव जोन में 20,000 घन मीटर अवैध खनन,
  • सेंचुरी क्षेत्र में अवैध उत्खनन,
  • अवैध वृक्ष पातन
    को लेकर तीन वन अपराध दर्ज हैं।

फिर भी एक ही संवेदनशील क्षेत्र में निरंतर पदस्थ रहना—
❓ क्या यह सिर्फ संयोग है?

हाईकोर्ट और NGT एंगल: सीधी अवहेलना के संकेत

विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रकरण

  • NGT के ईको सेंसिटिव जोन संबंधी दिशा-निर्देशों,
  • हाईकोर्ट के वन संरक्षण आदेशों,
  • और वन्यजीव संरक्षण कानूनों
    की सीधी अवहेलना का मामला बनता है।

👉 यदि यह तथ्य न्यायिक मंच पर जाते हैं, तो

  • NGT में स्वतः संज्ञान,
  • हाईकोर्ट में जनहित याचिका,
  • और परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति पर पुनर्विचार
    जैसे विकल्प खुल सकते हैं।

BNS धाराओं में भी केस दर्ज करने की मांग

वन विभाग ने मांग की है कि

  • वनकर्मियों पर हमला,
  • बंधक बनाना,
  • धमकी देना,
  • शासकीय संपत्ति छुड़ाना
    भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अंतर्गत भी गंभीर अपराध हैं।

👉 अतः वन अधिनियमों के साथ BNS की धाराओं में भी FIR दर्ज हो।

विश्लेषण: यह सिर्फ अवैध खनन नहीं, सिस्टम का एक्सपोज़ है

यह मामला अब
❌ एक SDO तक सीमित नहीं,
❌ एक ठेकेदार तक सीमित नहीं,
❌ और न ही एक परियोजना तक।

यह विकास परियोजनाओं की आड़ में संरक्षित जंगलों की संगठित लूट का उदाहरण है,
जहाँ कानून रोकता है,
और प्रशासन रास्ता दिखाता है

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