6 डिग्री की ठंड में भी नहीं पिघले किसान, गजरौला के ‘ज़हरीले विकास’ के खिलाफ 19वें दिन भी जारी आंदोलन

“ठंड से नहीं, प्रदूषण से मर रहे हैं लोग” — गजरौला बना राष्ट्रीय जल–वायु आपदा का केंद्र
रिपोर्ट। अवनीश त्यागी
अमरोहा | 08 जनवरी 2026
कड़ाके की ठंड, घना कोहरा और जमा देने वाली हवाएं… लेकिन गजरौला के रासायनिक कारखानों के खिलाफ किसानों का गुस्सा इन सबसे कहीं ज्यादा तीखा है। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के नेतृत्व में शहबाजपुर डोर गांव में चल रहा किसान धरना आज 19वें दिन भी जारी रहा। तापमान भले ही 6 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया हो, लेकिन किसानों का हौसला और प्रतिरोध जरा भी नहीं डगमगाया।
अलाव के सहारे किसान, ज़हरीली हवा के साए में आंदोलन
ठंड से बचने के लिए अलाव जला रहे किसान एक सुर में कह रहे हैं—
“ठंड सह ली जाएगी, लेकिन प्रदूषण नहीं।”
धरना स्थल पर महिलाएं, बुजुर्ग और युवा बड़ी संख्या में मौजूद हैं। यह सिर्फ किसानों का आंदोलन नहीं, बल्कि जीने के अधिकार की लड़ाई बन चुका है।
गजरौला: उद्योगों का गढ़ या ‘राष्ट्रीय जल त्रासदी’?
भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने गजरौला को “देश की सबसे अनदेखी पर्यावरणीय आपदाओं में से एक” बताया।
उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि—
- रासायनिक कारखानों ने पर्यावरणीय नियमों की धज्जियां उड़ाईं
- भूजल को जहरीला बना दिया
- हवा को सांस लेने लायक नहीं छोड़ा
- और यह सब राजनीतिक संरक्षण व मिलीभगत से हुआ
“विकास और विनाश के फर्क को अब समझना होगा, वरना गजरौला इंदौर जैसी जल त्रासदी से भी बड़ा संकट बन जाएगा।”
हवा में सिलिका, पानी में ज़हर—बीमारियों की सुनामी
धरने में मौजूद प्रमुख सचिव अरुण सिद्धू ने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा कि गजरौला की हवा में सिलिका कण और जहरीले रसायन गंभीर बीमारियों को जन्म दे रहे हैं।
बढ़ती बीमारियां:
- अस्थमा
- फेफड़ों के रोग
- हृदय रोग
- प्रजनन क्षमता में गिरावट
सबसे ज्यादा खतरे में—
बच्चे, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं
“अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में सांस लेना भी संघर्ष बन जाएगा।”
नीतियां उद्योगों के लिए, मौत किसान–मजदूरों के हिस्से?
भाकियू प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान ने सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि—
“सरकार की प्राथमिकता बड़े औद्योगिक घराने हैं, किसान नहीं।”
उन्होंने कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स का हवाला देते हुए बताया कि दूषित पानी के कारण भारत में हर साल लाखों लोगों की मौत हो रही है, लेकिन गजरौला जैसे औद्योगिक प्रदूषण केंद्रों पर कार्रवाई न के बराबर है।
संसद में उठी थी आवाज़, आज भी याद हैं जननेता
किसान नेताओं ने कहा कि गजरौला प्रदूषण का मुद्दा संसद में उठाने वाले तत्कालीन सांसद हरीश नागपाल को आज भी क्षेत्रवासी याद करते हैं।
धरनारत किसानों का दो टूक ऐलान—
“हम ठंड में ठिठुर रहे हैं, लेकिन प्रदूषण से मौत की ठंड कहीं ज्यादा खतरनाक है। जब तक कारखानों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, आंदोलन रुकेगा नहीं।”
महिलाओं और बुजुर्गों की भागीदारी ने बढ़ाई आंदोलन की ताकत
धरने में गिरेंद्र सिंह, चौधरी चरण सिंह, नूर अहमद, मुमताज अहमद, विकास सिंह, कौशल शर्मा, एहसान अली, दानिश, तालिब चौधरी, आसिफ चौधरी, साइना आलम, रघुवीर सिंह, होमपाल सिंह, मलखान सिंह, गीता, सोनी, बबीता सैनी, उर्मिला, रानी, सरिता सहित सैकड़ों किसान मौजूद रहे।
महिलाओं और बुजुर्गों की सक्रिय भागीदारी ने आंदोलन को नैतिक और जनआंदोलन का स्वरूप दे दिया है।
गजरौला चेतावनी है, सिर्फ खबर नहीं
गजरौला का यह किसान आंदोलन अब सिर्फ धरना नहीं रहा। यह सवाल बन गया है—
क्या विकास की कीमत इंसानी ज़िंदगी होगी?
अगर प्रशासन ने अब भी आंखें मूंदी रखीं, तो यह आंदोलन प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा विस्फोट बन सकता है।
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