चार साल तक मुआवजा नहीं, अब डीएम का सरकारी बंगला कुर्क!
लारा कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश, प्रशासनिक लापरवाही पर न्यायिक प्रहार
मुरादाबाद/बिजनौर।
भूमि अधिग्रहण के मामलों में वर्षों से न्याय का इंतज़ार कर रहे किसानों और जमीन मालिकों के लिए यह फैसला नजीर बन सकता है। मुरादाबाद स्थित लारा कोर्ट (भूमि अर्जन, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण) ने मुआवजा न देने पर डीएम बिजनौर के शासकीय आवास को कुर्क करने का सनसनीखेज आदेश पारित कर दिया है।
कोर्ट ने साफ किया है कि यदि न्यायिक आदेशों की अवहेलना होगी तो प्रशासनिक पद और रुतबा किसी के लिए ढाल नहीं बनेंगे।
डीएम आवास कुर्क, लेकिन निगरानी में रहेगा उपयोग
अदालत ने आदेश 21 नियम 54 सीपीसी के तहत डीएम बिजनौर के सरकारी आवास को कुर्क करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि—
कुर्कशुदा आवास को किसी भी स्थिति में बेचा, ट्रांसफर या किराये पर नहीं दिया जाएगा
कोई आर्थिक लाभ आवास से नहीं लिया जा सकेगा
हालांकि, कुर्की की अवधि में डीएम कार्यालयीय क्षमता के अनुरूप आवास का उपयोग कर सकेंगे
यह आदेश अपने आप में यह दर्शाता है कि अदालत ने संतुलन बनाते हुए सख्ती और संवैधानिक मर्यादा दोनों का पालन किया है।
13 मार्च 2020 का फैसला, चार साल की अनदेखी
वादी उमेश की ओर से अदालत को बताया गया कि—
13 मार्च 2020 को भूमि अधिग्रहण मुआवजा भुगतान का निर्णय पारित हुआ
इसके बाद भी जिला प्रशासन द्वारा एक भी रुपया अदा नहीं किया गया
कई बार तगादा, अनुरोध और न्यायिक नोटिस के बावजूद कोई आख्या प्रस्तुत नहीं हुई
अधिवक्ता ने दलील दी कि जिला प्रशासन भुगतान करने में सक्षम है, लेकिन लापरवाही और उदासीनता के चलते भुगतान नहीं किया गया।
सीपीसी की धाराओं के बावजूद नहीं झुका प्रशासन
मामले की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि—
पहले ही धारा 41(2) सीपीसी के तहत नोटिस जारी हो चुका
आदेश 21 नियम 37 सीपीसी के तहत कार्यवाही पूरी हो चुकी
इसके बावजूद जिला प्रशासन ने अदालत के आदेशों को गंभीरता से नहीं लिया
इन परिस्थितियों में अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कुर्की का आदेश पारित किया।
सुप्रीम कोर्ट का हवाला, छह माह में निष्पादन जरूरी
वादी पक्ष ने उच्चतम न्यायालय के ‘राजामणि’ फैसले का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि—
हर निष्पादन वाद का निस्तारण अधिकतम छह माह के भीतर होना चाहिए।
चार वर्षों से लंबित भुगतान को अदालत ने न्यायिक आदेशों की खुली अवहेलना माना।
9 जनवरी 2026: डीएम कोर्ट में होंगी पेश
लारा कोर्ट ने आदेश 21 नियम 54 (1)(क) सीपीसी के तहत यह अपेक्षा की है कि—
9 जनवरी 2026 को डीएम बिजनौर स्वयं न्यायालय में उपस्थित होंगे
कुर्कशुदा संपत्ति के विक्रय की उद्घोषणा की शर्तें तय की जाएंगी
यह संकेत है कि यदि भुगतान नहीं हुआ तो मामला और गंभीर मोड़ ले सकता है।
प्रशासनिक जवाबदेही पर न्यायपालिका की सख्त नजर
यह फैसला सिर्फ एक व्यक्ति के मुआवजे का मामला नहीं है, बल्कि यह संदेश है कि—
✔️ न्यायालय के आदेश सर्वोपरि हैं
✔️ सरकारी पद किसी को कानून से ऊपर नहीं रखता
✔️ आम नागरिक के अधिकारों की अनदेखी अब भारी पड़ सकती है
निष्कर्ष:
एक केस, कई सवाल
अब बड़ा सवाल यही है—
👉 क्या डीएम बिजनौर न्यायालय के आदेश का सम्मान करते हुए भुगतान करेंगे?
👉 या फिर कुर्की की कार्यवाही आगे बढ़ते हुए प्रशासन के लिए नई मिसाल बनेगी?
लारा कोर्ट का यह आदेश प्रशासनिक तंत्र के लिए चेतावनी है— न्याय में देरी अब सीधे जिम्मेदारी तय करेगी।











