15 दिन का रोमांचक पीछा, थर्मल ड्रोन की नजर, विशेषज्ञों की रणनीति—वन विभाग ने हासिल की बड़ी कामयाबी
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अवनीश त्यागी की स्पेशल रिपोर्ट
बिजनौर, 15 नवम्बर 2025।
अमानगढ़ रेंज से लगभग 8 किलोमीटर बाहर आबादी वाले क्षेत्र में 15 दिनों से विचरण कर रही मादा बाघिन को आखिरकार DFO जय सिंह कुशवाह, ACF ज्ञान सिंह, वन विभाग की हाई-टेक और बहु-स्तरीय रणनीति ने काबू कर लिया। यह ऑपरेशन न केवल तकनीकी दृष्टि से शानदार रहा, बल्कि मानव–वन्यजीव संघर्ष को टालने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण भी साबित हुआ।
ग्रामीण क्षेत्र में लगातार घूम रही इस बाघिन से लोगों में दहशत बढ़ती जा रही थी। ऐसे में वन विभाग ने चुनौती को स्वीकार करते हुए दिन-रात की तैयारी, आधुनिक उपकरणों का उपयोग और रणनीतिक कंबिंग के सहारे इस मिशन को सफल बनाया।
अभियान की रीढ़: शीर्ष अधिकारियों की लगातार मॉनिटरिंग
इस अभियान की कमान सीधे उच्च अधिकारियों के हाथ में थी—
- मुख्य वन संरक्षक, बरेली
- वन संरक्षक, मुरादाबाद श्री रमेश चंद्र
दोनों अधिकारियों ने जमीनी टीम से हर पल जुड़े रहकर न केवल दिशा-निर्देश दिए, बल्कि मिशन के हर महत्वपूर्ण मोड़ पर निर्णय भी लिए।
ज़मीनी युद्धस्तर की टीम: अनुभवी अधिकारियों का मजबूत संयोजन
- डीएफओ बिजनौर: जय सिंह कुशवाहा
- एसडीओ बिजनौर: ज्ञान सिंह
- रेंजर नगिना: प्रदीप शर्मा
- वन्यजीव विशेषज्ञ: डॉ. दक्ष गंगवार
इन अधिकारियों और वनकर्मियों की टीमें पिछले 15 दिनों से जंगल, खेत, बाग और आबादी वाले हिस्सों में लगातार कंबिंग कर रही थीं।
थर्मल ड्रोन की एंट्री—जब जंगल की छाया से मिला बाघिन का सुराग
कई बार बाघिन की लोकेशन बदलने से ऑपरेशन मुश्किल होता जा रहा था।
वन विभाग ने इसके बाद थर्मल ड्रोन का सहारा लिया—
- बाघिन के शरीर की गर्मी से लोकेशन ट्रैक
- रात में भी साफ मूवमेंट रिकॉर्ड
- घने खेतों और झाड़ियों में छिपी स्थिति का पता
थर्मल ड्रोन द्वारा मिली सटीक लोकेशन ने इस अभियान को निर्णायक दिशा दी।
ग्राम मोहम्मदपुर राजौरी बना ऑपरेशन का ग्राउंड-ज़ीरो
थर्मल ड्रोन से मिली ताजा जानकारी के बाद वन विभाग की टीम सीधे ग्राम मोहम्मदपुर राजौरी पहुंची।
यहां—
- इलाके की रेखांकन किया गया
- बाघिन के संभावित रास्ते चिन्हित किए गए
- ग्रामीणों को सुरक्षित दूरी पर रोका गया
इसके बाद टीम ने एक बैट (प्रवेश-नियंत्रित मार्ग) तैयार किया, ताकि बाघिन को रणनीतिक रूप से एक सुरक्षित इलाके की ओर मोड़ा जा सके।
रेस्क्यू ट्रैक्टर + ट्रैंक्विलाइजिंग यूनिट की मिनट-टू-मिनट कार्रवाई
डॉ. दक्ष गंगवार की विशेषज्ञता ने इस ऑपरेशन को नई ऊंचाई दी।
- रेस्क्यू ट्रैक्टर पर ट्रैंक्विलाइजिंग सेटअप तैयार किया गया
- फायर लाइन तय की गई
- सही दूरी और समय का हिसाब लगाया गया
जैसे ही बाघिन बैट के भीतर आई, विशेषज्ञों ने सटीक निशाना लगाकर उसे ट्रैंक्विलाइज किया।
सबसे महत्वपूर्ण—बाघिन को कोई चोट नहीं आई और ग्रामीण पूरी तरह सुरक्षित रहे।
कुछ ही पलों में बाघिन का नियंत्रण और सुरक्षित केजिंग पूरी कर ली गई।
15 दिनों तक चला अलर्ट: रात-दिन गश्त और खतरे की घड़ी
इन 15 दिनों में वन विभाग ने—
- खेतों में फुट पेट्रोलिंग
- रात में ड्रोन सर्विलांस
- ट्रैप कैमरा से निगरानी
- ग्रामीणों को जागरूक करना
- बफर टीमें तैनात करना
जैसे कदम उठाए।
इस दौरान कई बार बाघिन खेतों, बागों और नदी किनारे भी देखी गई, जिससे स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो गई।
क्यों बढ़ रहा है बाघों का आबादी क्षेत्र की ओर रुख?
एक गहरा सवाल…**
बाघों के प्राकृतिक आवास में कम होती जगह, भोजन की उपलब्धता में कमी और जंगली क्षेत्र का खिसकना बड़ी वजहें मानी जा रही हैं।
यह घटना इस बात की ओर संकेत करती है कि वन्यजीव संरक्षण और क्षेत्रीय प्रबंधन के बीच गंभीर संतुलन की जरूरत है।
अब आगे—स्वास्थ्य जांच और सुरक्षित क्षेत्र में पुनर्वास
रेस्क्यू के बाद बाघिन को सुरक्षित जगह ले जाया गया है, जहां—
- स्वास्थ्य जांच
- व्यवहारिक मूल्यांकन
- फिर सुरक्षित जंगल क्षेत्र में रिलीज
किया जाएगा।
टीमवर्क, तकनीक और त्वरित निर्णय—बिजनौर का ऐतिहासिक रेस्क्यू ऑपरेशन
यह ऑपरेशन सिर्फ एक बाघिन को पकड़ने की कहानी नहीं, बल्कि वन विभाग की क्षमता, संवेदनशीलता और आधुनिक तकनीक के सटीक उपयोग का उदाहरण है।
15 दिन का यह संघर्ष यह साबित करता है कि—
जब सुरक्षा, विशेषज्ञता और तकनीक एक साथ काम करें, तो सबसे कठिन वन्यजीव रेस्क्यू भी सुरक्षित और सौ प्रतिशत सफल हो सकता है।
यह मिशन आने वाले समय में मानव–वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन की एक प्रेरक मिसाल बनकर दर्ज होगा।











