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“सरकार देखती रही, जनता ने बना दिया पुल!”

“सरकार देखती रही, जनता ने बना दिया पुल!”

प्रतापगढ़ के गजेहड़ा गांव में बकुलाही नदी पर ग्रामीणों ने किया कमाल — बिना सरकारी फंड, सिर्फ जनसहयोग से 84 फीट लंबा लोहे का पुल तैयार

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🔹 मुख्य झलकियाँ (Quick Highlights)
  • जनता का जज्बा: बिना सांसद–विधायक की मदद, गांववालों ने खुद बनाया पुल
  • लोहे की ताकत: 84 फीट लंबा, 5 फीट चौड़ा पुल — ₹5 लाख की लागत
  • सरकार का योगदान? ज़ीरो!
  • मदरसे के बच्चों को राहत: अब नहीं बहता बांस का पुल
  • एसडीएम ने रोकना चाहा, लेकिन ग्रामीणों ने हार नहीं मानी
  • रास्ते का विवाद सुलझने के बाद शासन को भेजा जाएगा प्रस्ताव

जनता का जज्बा — जब सिस्टम सोया, तब गांव जागा!

प्रतापगढ़ जिले के मानधाता ब्लॉक के गजेहड़ा गांव में इतिहास लिखा गया है।
जहां वर्षों से लोग नेताओं और अफसरों के चक्कर लगा-लगाकर थक चुके थे,
वहीं इस बार उन्होंने “सरकार का इंतजार नहीं, समाधान खुद करने” की ठानी —
और जनसहयोग से लोहे का पुल खड़ा कर दिया!

बकुलाही नदी पर बना यह पुल अब सैकड़ों ग्रामीणों और बच्चों के लिए राहत की सांस बना है।
बरसों से यहां बांस या लकड़ी का अस्थायी पुल हर बारिश में बह जाता था।
लेकिन इस बार जनता ने ठान लिया — अबकी बार, लोहे का वार! 

₹5 लाख जुटाए, पुल बनाकर दिखाया!

गजेहड़ा के ग्रामीणों ने लगभग ₹5 लाख का चंदा इकट्ठा किया।
पैसे, श्रम और उत्साह — तीनों ने मिलकर यह कमाल कर दिखाया।
न विधायक का सहयोग, न सांसद का समर्थन, न मंत्री की नज़र —
फिर भी पुल खड़ा हो गया, जनता की अपनी मेहनत से!

“सालों तक हम अधिकारियों के दरवाज़े खटखटाते रहे,
जब कोई नहीं सुनता, तो जनता खुद ही सरकार बन जाती है।”
— स्थानीय ग्रामीण

एसडीएम नैन्सी ने दी चेतावनी, ग्रामीण बोले — ‘हम रुकेंगे नहीं’!

निर्माण के दौरान एसडीएम सदर नैन्सी निरीक्षण पर पहुँचीं और
सुरक्षा कारणों से काम रोकने के निर्देश दिए।
लेकिन ग्रामीणों का जवाब था साफ़ —

“अगर अब रोका, तो हमारे बच्चों का भविष्य रुक जाएगा।”

और फिर — पुल बनकर तैयार हो गया।
आज उसी पुल से बच्चे, महिलाएँ, बुज़ुर्ग सुरक्षित आवागमन कर रहे हैं।

पुल बना, पर रास्ता अटका — शासन को भेजा जाएगा प्रस्ताव

एसडीएम नैन्सी और सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता आशुतोष सारस्वत
ने पुल का निरीक्षण कर कहा —

“बिना रास्ते के पुल बेकार है। जिनकी जमीन है,
उनसे खसरा–खतौनी में रास्ता दर्ज कराइए, तभी शासन को प्रस्ताव भेजा जाएगा।”

ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने भूमिधारकों से शपथ पत्र ले लिए हैं,
जल्द ही रास्ता राजस्व अभिलेखों में दर्ज कराकर प्रस्ताव भेजा जाएगा।

फिलहाल सिर्फ पैदल चलने की अनुमति

एसडीएम ने पुल को अस्थायी बताते हुए निर्देश दिया है कि
फिलहाल ई-रिक्शा या भारी वाहन न चलें
सिर्फ पैदल यात्री और साइकिल वाले ही पुल का उपयोग कर सकेंगे।

गांव की आवाज — “अबकी बार, जनता सरकार!”

ग्रामीणों का कहना है —

“नेता वोट के वक्त आए, फिर गायब हो गए।
हमने ठान लिया कि अपने बच्चों के लिए रास्ता खुद बनाएँगे —
और हमने बना भी लिया!”

📍 पुल की खासियतें

  • लोहे की संरचना, लंबाई 84 फीट, चौड़ाई 5 फीट
  • लागत: लगभग ₹5 लाख (पूरी तरह जनसहयोग से)
  • स्थान: नरहर पट्टी और गजेहड़ा गांव के बीच, दूरी लगभग 4 किमी
  • नदी: बकुलाही
  • उद्देश्य: बच्चों और ग्रामीणों के आवागमन में स्थायी सुविधा

💬 निष्कर्ष — जब जनता ठान ले, तो असंभव कुछ नहीं!

गजेहड़ा गांव की इस मिसाल ने दिखा दिया कि विकास केवल सरकारी फाइलों में नहीं,
जनता के इरादों में भी लिखा जा सकता है।
यह पुल सिर्फ लोहे का नहीं — यह जनता की एकता, जज्बे और उम्मीद का पुल है।


🖋️ रिपोर्ट: अद्वैत दशरथ तिवारी
📍 मानधाता, प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश)

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