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किसान संगठन का प्रशासन को अल्टीमेटम: “ट्रैक्टर–ट्रॉली रोको, नहीं तो आंदोलन होगा विस्फोटक”

गन्ना ढुलाई पर टकराव की आहट!

किसान संगठन का प्रशासन को अल्टीमेटम: “ट्रैक्टर–ट्रॉली रोको, नहीं तो आंदोलन होगा विस्फोटक”

 बिजनौर से बड़ी रिपोर्ट

गन्ना सीजन शुरू होने से पहले ही शुगर मिल प्रबंधन, परिवहन विभाग और किसान संगठनों के बीच तनाव गहराने लगा है।
भारतीय किसान यूनियन (भानु) ने एआरटीओ और मिल प्रबंधकों को पत्र लिखकर ट्रैक्टर–ट्रॉली से गन्ना ढुलाई पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है। संगठन का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया कानूनविरुद्ध, खतरनाक और जनता की जान से खिलवाड़ है।

 किसान संगठन का आरोप – “मिलें नियम तोड़ रही हैं”

  • शुगर मिलें टेंडर प्रक्रिया के बावजूद ट्रैक्टर–ट्रॉली से गन्ना ढुलाई करा रही हैं
  • ट्रैक्टर केवल कृषि प्रयोजन के लिए पंजीकृत होते हैं, वाणिज्यिक मालवाहन के लिए नहीं।
  • ओवरलोडिंग के चलते सड़कों पर मौत का खतरा हर पल मंडरा रहा है
  • बीते वर्षों में दर्जनों हादसे और जनहानि इसकी गवाही दे चुके हैं।

 गौतम शर्मा (प्रदेश उपाध्यक्ष, भा.कि.यू. भानु) का तीखा बयान

“गन्ना सीजन आते ही प्रशासन और मिलें अपनी जिम्मेदारी भूल जाती हैं।
जनहित के खिलाफ ट्रैक्टर–ट्रॉली से ओवरलोड गन्ना ढोया जा रहा है।
अगर अबकी बार भी हालात नहीं सुधरे तो किसान संगठन सड़क पर उतरेगा और आंदोलन तेज होगा।”

 प्रशासन के सामने चुनौती

  1. सड़क सुरक्षा कानून का पालन सुनिश्चित करना।
  2. गन्ना ढुलाई को सिर्फ ट्रकों तक सीमित करना
  3. ट्रकों पर भी ओवरलोडिंग रोकने के लिए निगरानी बढ़ाना
  4. किसान संगठनों के आंदोलन से पहले संवाद और समाधान तलाशना

 विश्लेषण: क्यों बढ़ा तनाव?

  • मिलों का मुनाफा बनाम जनता की सुरक्षा – सस्ता विकल्प ट्रैक्टर–ट्रॉली, लेकिन खतरा दोगुना।
  • प्रशासन की चुप्पी – हादसे होने के बाद ही कार्रवाई, पहले लापरवाही।
  • किसानों का गुस्सा – बार-बार चेतावनी के बावजूद हालात जस के तस।
  • आंदोलन का डर – सीजन के बीच विरोध प्रदर्शन मिलों और सरकार दोनों के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है।

 बड़ा सवाल

  • क्या प्रशासन शुगर मिल लॉबी के दबाव से झुका हुआ है?
  • क्या सड़क सुरक्षा कानून सिर्फ कागज़ों में सीमित है?
  • क्या किसानों का आंदोलन आने वाले दिनों में राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

गन्ना सीजन अभी शुरू ही हुआ है और विवाद ने पहले ही तूल पकड़ लिया है।
अगर प्रशासन ने समय रहते कदम नहीं उठाए तो बिजनौर ही नहीं, पूरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश किसान आंदोलन और प्रशासनिक टकराव का अखाड़ा बन सकता है।

 

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