बिजनौर में गुलदार का आतंक: किसानों का गुस्सा उफान पर, भेड़ें बांधकर DFO दफ्तर को बनाया प्रतीकात्मक “पशुशाला”

बिजनौर। जंगल से निकलकर आबादी में आ रहे गुलदार अब तक दर्जनों लोगों और पशुओं की जान ले चुके हैं। ग्रामीणों में दहशत है, लेकिन वन विभाग के हाथ खाली हैं। लगातार नाकाम कोशिशों और बढ़ते हमलों से परेशान किसानों ने सोमवार को गुस्से का बड़ा इज़हार किया। भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चौधरी दिगंबर सिंह के नेतृत्व में किसानों ने भेड़ों को लेकर बिजनौर डीएफओ कार्यालय का घेराव किया। प्रदर्शनकारियों ने वहां भेड़ें बांध दीं और पूरे परिसर को प्रतीकात्मक “पशुशाला” बना दिया।
क्यों भड़के किसान?
- गुलदार हमले लगातार: ग्रामीण इलाकों में खेतों और घरों के आसपास गुलदार के हमले बढ़ते जा रहे हैं। पशु मारे जा रहे हैं और अब तक कई लोगों की जान भी गई है।
- वन विभाग की नाकामी: ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग कागज़ी दावों तक सीमित है। ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नज़र नहीं आती।
- जनप्रतिनिधियों की चुप्पी: किसान नेताओं का आरोप है कि राजनीतिक दल जनता की पीड़ा पर चुप हैं, जबकि पिछले साल विधानसभा में गुलदार मुद्दे पर “नाटक” रचे गए थे।
दिगंबर सिंह का बयान – नेताओं और अफसरों पर तीखा हमला
बीकेयू (अराजनैतिक) नेता चौधरी दिगंबर सिंह ने प्रदर्शन के दौरान कहा:
“पिछले साल विधानसभा में मुखौटे लगाकर वाहवाही लूटी गई। सरकार से वादे किए गए, लेकिन अब जब गुलदार लोगों की जान ले रहा है तो नेता चुप बैठे हैं। सरकारी मशीनरी दफ्तरों से बाहर निकलने को तैयार नहीं। अगर ये दफ्तर जनता के लिए नहीं खुलेंगे तो इन्हें पशुओं से भरना पड़ेगा।”
उनके इस बयान ने न सिर्फ अधिकारियों पर सवाल खड़े किए बल्कि जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता भी उजागर की।
DFO दफ्तर क्यों बना किसानों का निशाना?
किसानों ने भेड़ें बांधकर यह संदेश देने की कोशिश की कि वन विभाग के दफ्तर अब जनता की सेवा छोड़कर बेकार हो चुके हैं।
- पूरे परिसर में भेड़ों को बांधकर किसानों ने प्रतीकात्मक विरोध दर्ज किया।
- घटना के बाद वन विभाग के कर्मचारी और अधिकारी दफ्तर से गायब हो गए।
- किसानों का कहना है कि यदि हालात नहीं सुधरे तो आंदोलन और तेज़ किया जाएगा।
राजनीति और आंदोलन का नया मोड़
गुलदार मुद्दे ने अब राजनीतिक रंग लेना शुरू कर दिया है।
- बसपा ने इस मामले पर खुलकर आवाज़ उठाई है और सरकार को कटघरे में खड़ा किया है।
- भाकियू भी इस आंदोलन में शामिल होने की तैयारी में है।
- अन्य किसान संगठनों ने भी संकेत दिए हैं कि अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे भी आंदोलन में उतरेंगे।
इससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और बड़ा हो सकता है और जिला प्रशासन पर दबाव कई गुना बढ़ जाएगा।
वन विभाग की नाकामी
हालांकि वन विभाग का दावा है कि दो दिन से गुलदारों को पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर जाल बिछाए जा रहे हैं और पूरी टीम सक्रिय है, लेकिन अब तक कोई ठोस सफलता हाथ नहीं लगी।
- नतीजा यह कि गुलदार आज भी खुलेआम गांवों और जंगलों में घूम रहे हैं।
- ग्रामीण न तो दिन में खेतों में जा पा रहे हैं और न ही रात को चैन की नींद सो पा रहे हैं।
बिजनौर का गुलदार संकट अब केवल वन्यजीव संरक्षण का मुद्दा नहीं रहा। यह सीधा-सीधा किसानों की आजीविका, ग्रामीणों की सुरक्षा और सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ चुका है। किसानों का उग्र प्रदर्शन और राजनीतिक दलों का दखल इस मसले को बड़ा जनआंदोलन बना सकता है। अगर वन विभाग और प्रशासन ने जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह गुस्सा और व्यापक रूप ले सकता है।










