किसानों का वन विभाग से टकराव: रेंजर पर सुनवाई न करने का आरोप, जवाब में बोलीं – “मैं गश्त पर थी”
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अमानगढ़ टाइगर रिजर्व क्षेत्र के केहरीपुर कैंप कार्यालय पर रविवार को किसानों ने बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) से जुड़े किसानों ने आरोप लगाया कि वन क्षेत्राधिकारी (रेंजर) अंकिता किशोर ने उनकी समस्याएं नहीं सुनीं और कार्यालय के गेट अंदर से बंद करा दिए। नाराज किसानों ने मुख्य द्वार पर ताला जड़कर धरना दिया।
किसानों का पक्ष
- संगठन के तहसील अध्यक्ष सरदार दर्शन सिंह फौजी के नेतृत्व में किसानों ने धरना दिया।
- आरोप: रेंजर ने किसानों के आने की भनक लगते ही दोनों गेट अंदर से बंद करा दिए।
- समस्याएं सुनने की अपील पर भी कोई सुनवाई नहीं हुई।
- विवश होकर किसानों ने कार्यालय का मुख्य द्वार बंद कर धरना शुरू किया।
- धरने में महल सिंह, सलविंदर सिंह, सुखदीप सिंह, स्वर्ण सिंह, राजकुमार सिंह समेत दर्जनों किसान शामिल रहे।
रेंजर अंकिता किशोर का जवाब
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“मैं रूटीन गश्त पर वन क्षेत्र में थी, जहाँ नेटवर्क नहीं होता।”
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“धरने की कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई। लौटने पर भी किसान मिलने नहीं आए।”
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“हमने बातचीत के लिए बुलाया, लेकिन उस समय कोई नहीं आया।”
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“दरोगा को मौके पर भेजा गया, मगर धरनारत किसानों ने कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी।”
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“सुरक्षा की दृष्टि से कार्यालय के कुछ हिस्सों को वनरक्षकों ने बंद किया था।”
विश्लेषणात्मक दृष्टि
यह विवाद संवादहीनता और अविश्वास का परिणाम है।
- किसान कहते हैं कि उनकी समस्याओं को लगातार टाला जा रहा है।
- अधिकारी कहती हैं कि वे ड्यूटी पर थीं और धरने की जानकारी ही नहीं दी गई।
- यह घटना दर्शाती है कि किसानों और वन विभाग के बीच समन्वय और भरोसे की गंभीर कमी है।
- अगर संवाद की बेहतर व्यवस्था नहीं हुई तो यह टकराव आगे चलकर बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।
निष्कर्ष:
किसानों और वन विभाग के बीच भरोसे की खाई को पाटने के लिए आवश्यक है कि
- शिकायत निस्तारण की पारदर्शी व्यवस्था हो।
- अधिकारियों की मौजूदगी और किसानों से संवाद सुनिश्चित हो।
- विवाद को टकराव के बजाय संवाद के जरिये सुलझाने की प्राथमिकता दी जाए।











