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कर्मचारी संघर्ष समिति का आरोप, “कौड़ियों के दाम बेची जा रही है। एक लाख करोड़ की परिसंपत्ति”

पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत निगम का निजीकरण विवाद 

कर्मचारी संघर्ष समिति का आरोप,“ एक लाख करोड़ की परिसंपत्ति”
  • कौड़ियों के मोल” निजीकरण : कर्मचारी बोले – यह सुधार नहीं, सौदा है

  • 8732 करोड़ के निवेश के बाद निगमों को बेचने पर सवाल
  • 275वें दिन भी जारी धरना-प्रदर्शन, प्रदेशभर में बिजली कर्मियों का आक्रोश
  • उपभोक्ताओं के लिए बिजली महंगी होने का खतरा

हाइलाइट्स
  • 8732 करोड़ की योजनाओं के बाद भी निजीकरण पर सवाल

  • 6500 करोड़ रिजर्व प्राइस पर निगम सौंपने का आरोप

  • लगातार 275वें दिन प्रांतव्यापी धरना प्रदर्शन

  • एक लाख करोड़ की परिसंपत्तियों को ‘सस्ते सौदे’ में बेचने का आरोप

  • बिजली उपभोक्ताओं पर बढ़ेगा बोझ – संघर्ष समिति का दावा

समाचार रिपोर्ट

लखनऊ, 29 अगस्त 2025।
उत्तर प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण का कड़ा विरोध करते हुए आरोप लगाया है कि करोड़ों की योजनाओं के नाम पर निगमों को सुधार कर अब निजी घरानों को “कौड़ियों के मोल” बेचा जा रहा है।

📌 अरबों की योजनाओं के बावजूद निजीकरण पर सवाल

  • समिति के मुताबिक, बिजनेस प्लान के तहत 16.43 अरब रुपए और
  • आरडीएसएस योजना के तहत 7089 करोड़ रुपए
    इन दोनों निगमों पर खर्च किए जा रहे हैं।
    यानि कुल मिलाकर 8732 करोड़ रुपए बिजली व्यवस्था सुधार में लगाए जा रहे हैं।

लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से इन निगमों को केवल 6500 करोड़ रुपए की रिजर्व प्राइस पर निजी हाथों में सौंपने की तैयारी है।

📌 परिसंपत्तियों का मूल्य बनाम बिक्री मूल्य

संघर्ष समिति का दावा है कि पूर्वांचल व दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों की परिसंपत्तियों का वास्तविक मूल्य लगभग एक लाख करोड़ रुपए है। ऐसे में महज 6500 करोड़ की रिजर्व प्राइस पर बेचने का औचित्य नहीं है।

📌 275वें दिन भी जारी आंदोलन

निजीकरण के विरोध में प्रदेशभर में बिजली कर्मियों का आंदोलन लगातार जारी है। आज प्रदर्शन का 275वां दिन रहा। कर्मचारी नेताओं ने सरकार और पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन पर “निजी घरानों से मिलीभगत” का आरोप लगाया।

📌 उपभोक्ताओं पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि निजीकरण के बाद सबसे बड़ा असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।

  • बिजली दरों में बढ़ोतरी
  • सेवाओं के निजी हितों के अनुसार संचालन
  • ग्रामीण और छोटे कस्बों में उपेक्षा
    जैसे मुद्दे उपभोक्ताओं के लिए नई चुनौती बन सकते हैं।

👉 यह विवाद अब सिर्फ कर्मचारी हित तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या सरकारी निवेश से सुधारे गए निगम निजी कंपनियों को सस्ते में बेचे जा सकते हैं?

 

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