निजीकरण या ‘महंगा सौदा’? बिजलीकर्मियों के सवालों से घिरी यूपी सरकार

लखनऊ, 12 अगस्त 2025 | इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट | डिजिटल डेस्क
उत्तर प्रदेश में बिजली वितरण के निजीकरण को लेकर 258 दिन से चल रहा आंदोलन अब सरकार के लिए असहज सवालों की बौछार बन गया है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण को “घोटालों से भरा सौदा” करार देते हुए सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हस्तक्षेप की मांग की है।
सवालों की बौछार, सरकार जवाब दे !
❓ सवाल 1:
निजीकरण के बाद निजी कंपनियों को कितने साल तक और कितनी आर्थिक मदद दी जाएगी?
📌 आरोप: ड्राफ्ट स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट कहता है कि तब तक सब्सिडाइज्ड बल्क पावर परचेज कॉस्ट पर बिजली दी जाएगी, जब तक कंपनी मुनाफे में न आ जाए।
❓ सवाल 2:
जब सरकारी निगम घाटे में महंगे पावर परचेज एग्रीमेंट की वजह से हैं, तो इन्हीं शर्तों को सरकारी निगमों पर क्यों नहीं लागू किया जा सकता?
📌 आरोप: सरकारी निगमों को महंगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ती है—₹6,761 करोड़ सालाना फिक्स चार्ज सिर्फ करार निभाने के लिए, भले बिजली खरीदी न जाए।
❓ सवाल 3:
क्लीन बैलेंस शीट देने और घाटा सरकार पर डालने का मतलब क्या है?
📌 आरोप: निजीकरण के बाद कंपनियों को बिना कर्ज़-घाटे का बैलेंस मिलेगा, जबकि सरकार सब पुराने घाटे और देनदारियां उठाएगी।
❓ सवाल 4:
5-7 साल या उससे ज्यादा समय तक वित्तीय मदद देना सुधार है या सब्सिडी का नया जाल?
📌 आरोप: ड्राफ्ट डॉक्यूमेंट कहता है—जब तक कंपनियां आत्मनिर्भर न हों, सरकार की आर्थिक मदद जारी रहेगी।
❓ सवाल 5:
42 जिलों की सरकारी जमीन मात्र ₹1 प्रति वर्ष लीज पर क्यों?
📌 आरोप: वाराणसी, आगरा, गोरखपुर, प्रयागराज, कानपुर जैसी महंगी जमीन का मूल्यांकन किए बिना कौड़ियों के मोल सौंपना—किसका फायदा?
❓ सवाल 6:
किसानों-बुनकरों की सब्सिडी और सरकारी विभागों के बकाया निजी कंपनियों को दिया जाएगा, लेकिन यही रकम सरकारी निगमों को क्यों नहीं?
संघर्ष समिति का रुख
- निजीकरण की पूरी प्रक्रिया को “संदेहास्पद” और “घोटालों से भरी” बताया।
- मुख्यमंत्री से अपील—प्रभावी हस्तक्षेप कर निजीकरण निरस्त किया जाए।
- आरोप—यह सुधार नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति और संसाधनों को निजी हाथों में सौंपने की योजना है।
जमीनी हकीकत
258 दिन से जारी आंदोलन में आज भी सभी जिलों व परियोजनाओं पर बिजलीकर्मियों ने जोरदार प्रदर्शन किया।
समिति का दावा—अगर निजीकरण वाली सभी रियायतें सरकारी निगमों को मिल जाएं, तो वे भी घाटे से उबरकर मुनाफे में आ सकते हैं।










