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ऊर्जा विभाग में ‘निजीकरण’ की चिंगारी, ‘औद्योगिक अशांति’ का बड़ा खतरा!

            विद्युत विवाद | प्रदेशव्यापी असंतोष

ऊर्जा विभाग में ‘निजीकरण’ की चिंगारी, ‘औद्योगिक अशांति’ का बड़ा खतरा!

 

लखनऊ, उत्तर प्रदेश। 27 जुलाई 2025

बिजली कर्मचारियों का धैर्य टूटा, ऊर्जा मंत्री पर विश्वास नहीं—मुख्यमंत्री से सीधी मांग: विभाग अपने पास लें!”

मुख्य बातें (बुलेट हाइलाइटर):

  • निजीकरण की नीति से नाराज़ विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने 8 महीनों से शांतिपूर्ण आंदोलन चला रखा है।
  • ऊर्जा मंत्री अरविंद शर्मा पर आरोप—दो बार हुए समझौते से पलटे, कर्मचारियों से संवाद करने में नाकाम।
  •  निजीकरण के प्रयासों ने ऊर्जा निगमों में ‘औद्योगिक अशांति’ का माहौल बना दिया है।
  • महाकुंभ के दौरान 65 दिनों तक निर्बाध बिजली आपूर्ति—कर्मचारियों की जिम्मेदारी को प्रमाणित करती है।
  • मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ज्ञापन सौंपकर बिजली विभाग को खुद संभालने की मांग रखी गई है।
  • 2017 में 41% लाइन लॉस था, जो अब 15% तक घटा—कर्मचारियों ने खुद के प्रदर्शन से जताया भरोसा।
  •  कर्मचारी संगठनों का विश्वास: ऊर्जा मंत्री के नेतृत्व में सुधार असंभव, संवाद विफल, तालमेल खत्म!

क्या है मामला?

उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मियों और ऊर्जा मंत्रालय के बीच तनाव नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया है। पूर्वांचल व दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण के खिलाफ संघर्ष कर रहे बिजली कर्मचारी अब ऊर्जा मंत्री से भरोसा उठा चुके हैं

संघर्ष समिति के 17 घटक संगठनों ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर स्पष्ट कहा है कि—

“ऊर्जा मंत्री से बातचीत अब सारहीन हो चुकी है। निजीकरण के नाम पर कर्मचारियों के खिलाफ दमनकारी नीति अपनाई जा रही है।”

ज्ञापन की मुख्य माँगें:

  1. ऊर्जा विभाग का प्रभार मुख्यमंत्री स्वयं लें।
  2. निजीकरण की नीतियों पर पुनर्विचार हो।
  3. ऊर्जा मंत्री से हुए समझौतों को तत्काल लागू किया जाए।
  4. संघर्षरत कर्मचारियों से तत्काल वार्ता हो।

पृष्ठभूमि में क्या है?

  • दिसंबर 2022 और मार्च 2023 में दो बार हुए समझौते के बावजूद ऊर्जा मंत्री ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।
  • इस अनदेखी ने कर्मचारियों में गहरा असंतोष भर दिया है।
  • अब आंदोलन सिर्फ “संघर्ष” नहीं, बल्कि नीतिगत फैसलों के विरोध में सीधा प्रशासनिक आह्वान बन चुका है।

संगठनों की चेतावनी (संकेत में ही सही!)

“अगर समाधान नहीं निकला तो यह औद्योगिक अशांति उपभोक्ताओं की सेवा और पूरे ऊर्जा ढांचे को प्रभावित कर सकती है।”

क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सीधे हस्तक्षेप करेंगे?

राज्य की ऊर्जा व्यवस्था और आम जनता की सहूलियत को देखते हुए यह मुद्दा सिर्फ कर्मचारी-प्रशासन टकराव नहीं, बल्कि एक नीति-संकट में बदलता जा रहा है।

यह रिपोर्ट दर्शाती है कि किस प्रकार संवादहीनता और वादाखिलाफी से प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था पर संकट मंडरा रहा है। अब सभी की नजरें मुख्यमंत्री के अगले कदम पर टिकी हैं।

 

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