
विश्लेषणात्मक रिपोर्ट: अवनीश त्यागी
बिजनौर बना उत्तर भारत का ‘गुलदार ग्राउंड ज़ीरो’, जंगल से गांव तक फैली है मौत की परछाईं
हाइलाइट्स में खबर:
- गुलदारों की संख्या सैकड़ों में!
बिजनौर जनपद में गुलदारों की संख्या अब सैकड़ों में पहुंच चुकी है, और यह लगातार बढ़ती जा रही है। - अबतक के आंकड़े चौंकाने वाले हैं:
👉 करीब 50 गुलदार पिंजरों में कैद
👉 20 से अधिक गुलदार दुर्घटनाओं में मारे जा चुके
👉 30 से अधिक लोग गुलदारों का शिकार बन चुके हैं - वन विभाग संसाधनविहीन:
न मैनपावर, न आधुनिक उपकरण—अल्प संसाधनों के बल पर वन विभाग की जंग जारी, लेकिन नाकाफी साबित हो रही। - गांवों में पसरा डर:
मंडोरी गांव में 11 साल की बच्ची को गुलदार ने घर से उठाकर मार डाला। शव गन्ने के खेत में क्षत-विक्षत हालत में मिला। - कैद तो हुआ एक गुलदार, मगर…
केशोपुर के बिरला फार्म में एक गुलदार वन विभाग के पिंजरे में कैद, लेकिन दो अन्य गुलदार अब भी खुले में सक्रिय हैं। - यक्ष प्रश्न—”इस कदर बढ़ती आबादी पर नियंत्रण कैसे?”
न तो वन विभाग के पास जवाब है, न ही जिला प्रशासन के पास ठोस रणनीति।
विश्लेषण: जंगल बनाम जनजीवन – संघर्ष की उलटी गिनती
बिजनौर अब ‘वन्य जीव संकट’ का राष्ट्रीय प्रतीक बन गया है।
गुलदार अब जंगलों से निकलकर खेत, गलियों और घरों तक पहुंच चुके हैं।
एक ओर तेजी से बढ़ती गुलदारों की आबादी, दूसरी ओर वन विभाग के पास सिर्फ गिने-चुने पिंजरे, सीमित फोर्स और संसाधनहीन व्यवस्था।
क्या मानव जीवन वन्य नियमों की बलि चढ़ता रहेगा?
कई घटनाओं के बावजूद कोई दीर्घकालिक समाधान न शासन के पास है, न प्रशासन के पास।
ग्रामीणों का आरोप—“सरकार देखती क्यों नहीं?”
- सरकार की चुप्पी से ग्रामीणों में गुस्सा चरम पर
- किसान यूनियनों और सामाजिक संगठनों ने मांगी सीएम स्तर पर आपात बैठक
- “केवल पिंजरा नहीं, नीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए”
राहत के उपाय – जो अब ज़रूरी हैं:
✅ गुलदारों की जनगणना और GPS ट्रैकिंग सिस्टम
✅ हर ब्लॉक स्तर पर नाइट विज़न ड्रोन और ट्रैप कैमरे
✅ गांवों में वन विभाग की ‘रेपिड रिस्पॉन्स यूनिट’
✅ प्रदेश सरकार से विशेष वन्यजीव संकट राहत पैकेज
✅ वन्य अधिनियमों में व्यावहारिक संशोधन की बहस अनिवार्य
ग्राउंड से वाईट:
जयवीर सिंह, कर्मचारी – बिरला फार्म, केशोपुर
“हमने तो काफी पहले शिकायत की थी। एक गुलदार पिंजरे में फंस गया, मगर दो अब भी खेतों में घूमते हैं। क्या हर गांव खुद पिंजरे की मांग करे?”
बिजनौर अब सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि वन्यजीव आतंक का प्रतीक बन चुका है।
जब तक सरकार ठोस नीति नहीं लाती, तब तक “गुलदार बनाम गांव” की यह जंग जारी रहेगी।
और हर नई घटना यह याद दिलाएगी कि मानव जीवन की कीमत, वन्य नियमों से भी ऊपर होनी चाहिए।
रिपोर्ट: Target TV Live | जनपद बिजनौर











