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सुशासन दिवस पर सरकार की उपलब्धियों का बखान, लेकिन बांदा के उद्योगों पर चुप्पी

सुशासन दिवस पर सरकार की उपलब्धियों का बखान, लेकिन बांदा के उद्योगों पर चुप्पी
बांदा। रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज में उत्तर प्रदेश सरकार के आठ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में सुशासन दिवस का आयोजन किया गया। इस मौके पर प्रदेश के औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी ने सरकार की विभिन्न उपलब्धियों को गिनाया और आंकड़ों के माध्यम से राज्य में हुए विकास कार्यों का ब्योरा दिया। कार्यक्रम में सदर विधायक प्रकाश द्विवेदी समेत अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

सरकार की उपलब्धियों का गुणगान

मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी ने अपने संबोधन में प्रदेश सरकार के आठ साल के कार्यकाल को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि इन वर्षों में उत्तर प्रदेश ने कानून-व्यवस्था, आधारभूत संरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। उन्होंने आंकड़ों के जरिए बताया कि सरकार ने निवेशकों के लिए अनुकूल माहौल बनाया है, जिससे राज्य में उद्योगों का विस्तार हुआ है और रोजगार के अवसर बढ़े हैं।

बांदा के उद्योगों पर सवाल, पर जवाब नहीं

हालांकि, इस पूरे कार्यक्रम में बांदा में उद्योगों के विकास को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई। जबकि यह क्षेत्र अब भी औद्योगिक रूप से पिछड़ा माना जाता है। स्थानीय युवाओं को रोजगार के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है। ऐसे में औद्योगिक विकास मंत्री की मौजूदगी में भी बांदा के औद्योगिक विकास पर चर्चा न होना कई सवाल खड़े करता है।

राजनीतिक और प्रशासनिक सन्दर्भ

सुशासन दिवस के आयोजन का मुख्य उद्देश्य सरकार की उपलब्धियों को जनता के सामने प्रस्तुत करना था, लेकिन यह कार्यक्रम जनसमस्याओं पर ठोस चर्चा के बजाय सरकारी उपलब्धियों के प्रचार तक ही सीमित रहा। बांदा जैसे पिछड़े जिलों में औद्योगिक विकास की सुस्त गति पर सरकार की ओर से कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया गया, जिससे जनता के भीतर असंतोष बढ़ सकता है।

हालांकि, सरकार के आठ वर्षों की उपलब्धियों को लेकर किए गए दावे प्रभावशाली थे, लेकिन स्थानीय स्तर पर मुद्दों की अनदेखी इस आयोजन की सबसे बड़ी कमी रही। बांदा के लोगों को इस बात की उम्मीद थी कि मंत्री जी स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए कोई नई योजना या निवेश की घोषणा करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकारी कार्यक्रम केवल अपनी उपलब्धियों को गिनाने तक सीमित रह गए हैं, जबकि जमीनी मुद्दों पर ठोस पहल की जरूरत बनी हुई है।

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