अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर कार्रवाई में लापरवाही: जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल

BIJNOR. जनपद में अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटरों की समस्या के खिलाफ उठाए गए सवाल अब सच साबित हो चुके हैं। हरियाणा स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा धामपुर में अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटर पकड़े जाने और चांदपुर में बिना डॉक्टर के संचालित अल्ट्रासाउंड सेंटर का भंडाफोड़ किए जाने की घटनाओं ने प्रशासन की लापरवाही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन घटनाओं ने पहले प्रकाशित समाचार की पुष्टि की है, लेकिन जिलाधिकारी और नोडल पीसीपीएनडीटी की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
सत्यापित हुआ अवैध संचालन का आरोप
पिछले समाचार में अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटरों की भरमार का जो मुद्दा उठाया गया था, वह अब स्पष्ट हो चुका है। धामपुर और चांदपुर की घटनाओं ने यह दिखा दिया है कि अवैध सेंटर न केवल संचालित हो रहे थे, बल्कि उनकी निगरानी और रोकथाम में प्रशासन विफल रहा है। यह स्थिति पीसीपीएनडीटी अधिनियम के क्रियान्वयन में बड़ी चूक की ओर इशारा करती है।
जिलाधिकारी की कार्यशैली पर सवाल ?
पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत जिलाधिकारी नियत प्राधिकारी होते हैं, जिन पर जिले में अधिनियम लागू कराने की जिम्मेदारी होती है। बावजूद इसके, अवैध सेंटरों की सक्रियता और नोडल अधिकारी के खिलाफ किसी भी कार्रवाई की अनुपस्थिति से उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि पहले ही सख्त कदम उठाए गए होते, तो शायद ये अवैध सेंटर बंद हो चुके होते।
प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही का अभाव
मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) और नोडल अधिकारी ने भी इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। जब इनसे सवाल किए गए, तो उन्होंने एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने का काम किया। यह दर्शाता है कि प्रशासनिक तंत्र में न केवल उदासीनता है, बल्कि जवाबदेही का भी अभाव है।
सामाजिक और कानूनी प्रभाव
अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटर केवल कानून का उल्लंघन नहीं करते, बल्कि वे भ्रूण हत्या और लिंग चयन जैसी सामाजिक बुराइयों को बढ़ावा देने में सहायक होते हैं। ऐसे में इन सेंटरों का संचालन न केवल स्वास्थ्य प्रणाली के लिए खतरा है, बल्कि यह समाज की नैतिकता पर भी प्रहार है।
समस्या का समाधान और अपेक्षित कार्रवाई
यह जरूरी है कि जिलाधिकारी, सीएमओ और नोडल अधिकारी के खिलाफ जवाबदेही तय की जाए। साथ ही, सभी अल्ट्रासाउंड सेंटरों का पुनः सर्वेक्षण कर उनकी पंजीकरण स्थिति की जांच की जाए। दोषी पाए जाने वाले सेंटरों और अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
धामपुर और चांदपुर की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटरों का संचालन प्रशासनिक तंत्र की विफलता का परिणाम है। जब तक जिम्मेदार अधिकारियों को उनकी भूमिका के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जाएगा, तब तक ऐसी समस्याएं बनी रहेंगी। जनता और शासन के बीच विश्वास बहाली के लिए यह जरूरी है कि इस मामले में शीघ्र और पारदर्शी कार्रवाई की जाए।












