सीलिंग के दावे के बाद भी चलता रहा नजीबाबाद का अस्पताल! अब मेडिकल स्टोर से लाखों की दवाएं बरामद, उठे कई बड़े सवाल
ड्रग विभाग की कार्रवाई में एक लाख से अधिक की दवाएं जब्त होने का दावा | CMO के स्तर से पहले अस्पताल सील किए जाने का दावा, फिर संचालन कैसे जारी रहा? | डॉ. देवेंद्र बोले—अस्पताल के डॉक्टर के खिलाफ FIR, अस्पताल खाली | सवाल: अस्पताल खाली था तो इतनी दवाइयां कहां से आईं?
अवनीश त्यागी | TargetTvLive
बिजनौर। नजीबाबाद के बुंदकी रोड स्थित एक कथित रूप से अवैध नर्सिंग होम पर ड्रग विभाग की कार्रवाई ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर ही कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ड्रग इंस्पेक्टर पियूष कुमार शर्मा की कार्रवाई में मेडिकल स्टोर से एक लाख रुपये से अधिक कीमत की दवाइयां जब्त किए जाने और एफआईआर दर्ज कराए जाने की जानकारी सामने आई है।
लेकिन इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल दवाइयों की जब्ती से भी आगे का है।
यदि अस्पताल को कुछ समय पहले ही सील किए जाने का दावा किया गया था, तो उसके बाद भी वहां अस्पताल किस तरह संचालित होता रहा?
और अब जब संबंधित अधिकारी की ओर से अस्पताल खाली होने का दावा किया जा रहा है, तो दूसरा सवाल और ज्यादा पेचीदा हो गया है—
अगर अस्पताल खाली था तो वहां लाखों रुपये की दवाइयां आखिर कहां से आईं?
CMO के सील करने के दावे के बावजूद संचालन कैसे?
बताया जाता है कि इस अस्पताल के संबंध में कुछ समय पहले मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) की ओर से अस्पताल को सील किए जाने का दावा किया गया था। लेकिन स्थानीय स्तर पर सामने आई परिस्थितियां इस दावे पर सवाल खड़े करती हैं।
यदि वास्तव में अस्पताल को सील किया गया था तो सीलिंग के बाद वहां गतिविधियां कैसे चलती रहीं? क्या सील हटाई गई? यदि हटाई गई तो किसके आदेश पर? और यदि सील बरकरार थी तो दवाओं का स्टॉक वहां तक कैसे पहुंचा?
इन सवालों का जवाब केवल विभागीय रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकता है।
यही वजह है कि मामला अब सिर्फ एक मेडिकल स्टोर पर हुई कार्रवाई का नहीं रह गया है, बल्कि अस्पताल की सीलिंग, उसके बाद के संचालन और विभागीय निगरानी की पूरी व्यवस्था जांच के घेरे में आती दिखाई दे रही है।
डॉ. देवेंद्र का दावा—डॉक्टर के खिलाफ FIR, अस्पताल खाली
इस संबंध में डॉ. देवेंद्र की ओर से दावा किया गया है कि संबंधित अस्पताल के डॉक्टर के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई गई है और अस्पताल वर्तमान में खाली है।
यदि अस्पताल वास्तव में खाली था, तो ड्रग विभाग की कार्रवाई में एक लाख रुपये से अधिक मूल्य की दवाइयां बरामद होने की स्थिति अपने आप में जांच का विषय बन जाती है।
यहीं से इस प्रकरण का सबसे अहम सवाल सामने आता है—
अस्पताल खाली था तो दवाइयां किसकी थीं और वहां कैसे पहुंचीं?
क्या ये दवाइयां पहले से स्टॉक में थीं?
क्या इनका कोई खरीद रिकॉर्ड मौजूद है?
क्या मेडिकल स्टोर के पास वैध लाइसेंस था?
दवाओं की बिक्री कौन कर रहा था?
और यदि अस्पताल तथा मेडिकल स्टोर दोनों बंद/खाली बताए जा रहे थे तो दवाओं का इतना बड़ा स्टॉक वहां किस उद्देश्य से रखा गया था?
इन सवालों का जवाब जांच में सामने आना जरूरी है।
न साइनबोर्ड स्पष्ट, न फार्मासिस्ट की मौजूदगी
ड्रग विभाग की कार्रवाई के दौरान मेडिकल स्टोर का कोई स्पष्ट नाम या साइनबोर्ड नहीं मिलने और फार्मासिस्ट अथवा आवश्यक तकनीकी व्यक्ति की मौजूदगी नहीं मिलने की बात भी सामने आई है।
यदि जांच में इन परिस्थितियों की पुष्टि होती है तो दवा कारोबार के वैधानिक संचालन को लेकर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, अंतिम निष्कर्ष संबंधित दस्तावेजों, लाइसेंस और विभागीय जांच के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
कार्रवाई रोकने के लिए ‘माननीय’ के नाम का दबाव?
कार्रवाई के दौरान कथित तौर पर प्रभावशाली लोगों का नाम लेकर कार्रवाई रुकवाने अथवा प्रभावित करने का प्रयास किए जाने की चर्चा भी सामने आई है।
आरोप है कि कुछ लोगों को कथित रूप से ‘माननीय’ बताकर दबाव बनाने का प्रयास किया गया। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे फिलहाल आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
फिर भी यदि किसी सरकारी कार्रवाई को प्रभावित करने के लिए किसी जनप्रतिनिधि अथवा प्रभावशाली व्यक्ति का नाम इस्तेमाल किया गया, तो यह भी अपने आप में जांच का विषय होना चाहिए।
असली सवाल अस्पताल से बड़ा—निगरानी तंत्र कहां था?
इस पूरे प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण सवाल स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था से जुड़ता है।
यदि अस्पताल अनधिकृत रूप से संचालित हो रहा था तो उस पर कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई?
यदि अस्पताल को सील किया गया था तो सीलिंग के बाद उसकी निगरानी किसने की?
यदि सीलिंग के बाद भी गतिविधियां जारी रहीं तो इसकी जानकारी संबंधित अधिकारियों को कब हुई?
और यदि अस्पताल खाली था तो वहां बड़ी मात्रा में दवाओं का स्टॉक कैसे मौजूद मिला?
इन सवालों का जवाब सामने आना इसलिए जरूरी है क्योंकि मामला सीधे मरीजों की सुरक्षा और दवाओं की वैध बिक्री से जुड़ा है।
ड्रग इंस्पेक्टर की कार्रवाई ने खोल दिए कई सवाल
ड्रग इंस्पेक्टर पियूष कुमार शर्मा की कार्रवाई के बाद दवा कारोबार से जुड़े लोगों में हड़कंप की स्थिति बताई जा रही है। कार्रवाई में दवाओं की जब्ती और एफआईआर ने मामले को गंभीर बना दिया है।
लेकिन अब केवल मेडिकल स्टोर संचालक की भूमिका की जांच पर्याप्त नहीं होगी। यदि सीलिंग और उसके बाद संचालन से जुड़े दावे सही हैं तो सीलिंग के बाद अस्पताल में क्या हुआ, किसने निगरानी की और दवाओं का स्टॉक कब और कैसे पहुंचा, इसकी भी पड़ताल आवश्यक है।
अब दो जांच सबसे जरूरी
नजीबाबाद के इस प्रकरण में आगे की जांच को दो प्रमुख सवालों का जवाब देना होगा—
पहला— अस्पताल को सील किए जाने के दावे के बावजूद उसका संचालन कैसे जारी रहा?
दूसरा— अस्पताल खाली होने के दावे के बीच वहां एक लाख रुपये से अधिक की दवाइयां कैसे और किसकी मौजूदगी/व्यवस्था में पहुंचीं?
यदि इन दोनों सवालों के जवाब दस्तावेजों और जांच में मिल जाते हैं तो पूरे प्रकरण की तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है।
फिलहाल ड्रग विभाग की कार्रवाई ने एक मेडिकल स्टोर से दवाइयां जब्त करने से कहीं बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या विभागीय सीलिंग के बाद भी किसी अस्पताल का संचालन संभव है, और अगर हां, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
TargetTvLive इस मामले में सीलिंग संबंधी विभागीय रिकॉर्ड, एफआईआर और ड्रग विभाग की आगे की कार्रवाई से जुड़े तथ्यों पर नजर बनाए हुए है।












