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मनुस्मृति में महिलाओं का सम्मान भी, नियंत्रण भी; पुरुषों के लिए भी थे कठोर नियम—जानिए पूरा संदर्भ

मनुस्मृति में सिर्फ महिलाओं पर नियंत्रण? पुरुषों के लिए भी थे कठोर नियम, राहुल गांधी की टिप्पणी पर जरूरी सवाल

विश्लेषणात्मक टिप्पणी | अवनीश त्यागी | TargetTvLive

राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति को लेकर की गई टिप्पणी ने एक बार फिर उस बहस को हवा दे दी है, जो भारतीय राजनीति में समय-समय पर उठती रही है—क्या मनुस्मृति महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करने वाला ग्रंथ है?

राहुल गांधी ने महिलाओं की पहचान को केवल बेटी, पत्नी और मां तक सीमित करने वाली सोच पर सवाल उठाते हुए मनुस्मृति के प्रावधानों को महिला विरोधी बताया। उनकी टिप्पणी के बाद भाजपा समेत विरोधी दलों ने राजनीतिक प्रतिक्रिया दी।

लेकिन इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण पहलू अक्सर बहस से गायब हो जाता है—क्या मनुस्मृति में नियंत्रण और अनुशासन केवल महिलाओं के लिए निर्धारित था?

मनुस्मृति को उसके पूरे संदर्भ में पढ़ने पर तस्वीर कहीं अधिक जटिल नजर आती है।

मनुस्मृति में महिला: सम्मान भी, नियंत्रण भी

मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में महिलाओं के सम्मान को परिवार और सामाजिक व्यवस्था की समृद्धि से जोड़ा गया है। प्रसिद्ध श्लोक है—

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।”

अर्थात जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास माना गया है।

लेकिन इसी ग्रंथ में ऐसे प्रावधान भी हैं, जिनमें महिला की स्वतंत्रता को सीमित किया गया है। विशेष रूप से मनुस्मृति के अध्याय 5 और 9 में महिला के जीवन को पिता, पति और पुत्र के संरक्षण से जोड़ने वाली व्यवस्था दिखाई देती है।

यहीं से आधुनिक दृष्टि से आलोचना का आधार पैदा होता है।

आज के संवैधानिक भारत में महिला को स्वतंत्र नागरिक माना जाता है। वह अपने जीवन, शिक्षा, करियर, विवाह और व्यक्तिगत फैसलों के संबंध में समान अधिकार रखती है। इसलिए प्राचीन संरक्षक-आधारित व्यवस्था को आधुनिक स्वतंत्रता की कसौटी पर प्रश्नों के घेरे में रखना स्वाभाविक है।

लेकिन क्या पुरुष पूरी तरह स्वतंत्र थे?

यहीं बहस का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है।

मनुस्मृति पुरुष को किसी निरंकुश अधिकार का मालिक नहीं बनाती। पुरुष के लिए भी परिवार, समाज, धर्म और व्यक्तिगत आचरण से जुड़े अनेक कर्तव्य और मर्यादाएं निर्धारित करती है।

पति को पत्नी की रक्षा और परिवार के दायित्वों का निर्वहन करना है। वैवाहिक जीवन में केवल महिला ही नहीं, पुरुष से भी निष्ठा और संयम की अपेक्षा की गई है।

मनुस्मृति के अध्याय 9 में पति-पत्नी दोनों के लिए वैवाहिक निष्ठा को महत्वपूर्ण माना गया है।

अर्थात व्यवस्था को केवल इस एक वाक्य में समेट देना कि “मनुस्मृति में पुरुष नियंत्रक और महिला नियंत्रित थी” इतिहास और पाठ—दोनों को अत्यधिक सरल बना देना होगा।

अधिकार के साथ पुरुष पर दायित्व भी

प्राचीन सामाजिक व्यवस्था में ‘पुरुष अधिकार’ के साथ ‘पुरुष दायित्व’ भी जुड़ा हुआ था।

परिवार का पालन, पत्नी और संतान की सुरक्षा, सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन, धार्मिक अनुशासन और आत्मसंयम—पुरुष से अपेक्षित अनेक भूमिकाएं थीं।

इसलिए मनुस्मृति में पुरुष की स्थिति को केवल ‘स्वतंत्र व्यक्ति’ और महिला की स्थिति को केवल ‘पराधीन व्यक्ति’ के रूप में देखना भी अधूरा विश्लेषण होगा।

फिर भी दोनों के बीच अंतर मौजूद है।

पुरुष पर लगाए गए कर्तव्य और महिला की स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंध एक ही चीज नहीं हैं।

यही वह महीन रेखा है, जिसे राजनीतिक बहस अक्सर मिटा देती है।

सम्मान और स्वतंत्रता—क्या दोनों एक ही हैं?

मनुस्मृति की बहस का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शायद यही है।

किसी महिला को सम्मान देना और उसे स्वतंत्र निर्णय का अधिकार देना—दोनों अलग अवधारणाएं हैं।

यदि महिला को परिवार की प्रतिष्ठा और समृद्धि का केंद्र माना जाए, लेकिन उसके व्यक्तिगत निर्णयों को किसी पुरुष संरक्षक से जोड़ दिया जाए, तो आधुनिक लोकतांत्रिक दृष्टि से सवाल उठना स्वाभाविक है।

दूसरी ओर, यदि मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान से जुड़े श्लोकों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए और केवल प्रतिबंधात्मक श्लोकों के आधार पर पूरे ग्रंथ को परिभाषित कर दिया जाए, तो वह भी वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण नहीं होगा।

मनुस्मृति का पाठ विरोधाभासों से भरा सामाजिक ढांचा प्रस्तुत करता है—सम्मान भी, संरक्षण भी और स्वतंत्रता पर नियंत्रण भी।

राहुल गांधी की टिप्पणी का मजबूत पक्ष

राहुल गांधी का यह कहना कि महिला की पहचान केवल मां, पत्नी या बेटी तक सीमित नहीं होनी चाहिए, आधुनिक भारत के संदर्भ में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।

एक महिला इन रिश्तों के साथ-साथ स्वयं एक नागरिक है।

उसकी पहचान विद्यार्थी, वैज्ञानिक, शिक्षक, किसान, उद्यमी, अधिकारी, कलाकार, जनप्रतिनिधि या किसी भी अन्य भूमिका में हो सकती है।

इस अर्थ में महिला को केवल पारिवारिक रिश्तों के माध्यम से पहचानने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाना पूरी तरह प्रासंगिक है।

लेकिन आलोचना में संतुलन भी जरूरी

राहुल गांधी की टिप्पणी पर असहमति रखने वालों का यह तर्क भी विचारणीय है कि मनुस्मृति को उसके संपूर्ण सामाजिक संदर्भ से काटकर नहीं देखा जाना चाहिए।

मनुस्मृति आधुनिक संविधान की किताब नहीं है। वह प्राचीन भारतीय समाज की सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक व्यवस्था से संबंधित एक ग्रंथ है।

इसलिए आज के लोकतांत्रिक भारत में उसके हर प्रावधान को लागू करने या उससे आधुनिक सामाजिक व्यवस्था की सीधी तुलना करने का प्रश्न अलग है।

आज भारत की सर्वोच्च सामाजिक-राजनीतिक कसौटी संविधान है।

संविधान महिला और पुरुष दोनों को समान नागरिकता, समानता और गरिमा का अधिकार देता है।

भाजपा बनाम राहुल नहीं, इतिहास बनाम वर्तमान की बहस

मनुस्मृति पर राजनीतिक बयानबाजी को केवल भाजपा बनाम कांग्रेस के विवाद में बदल देना इस विषय को छोटा कर देता है।

असल सवाल यह है कि हम इतिहास को कैसे पढ़ते हैं?

क्या हम केवल उन अंशों को चुनेंगे जो हमारे राजनीतिक तर्क को मजबूत करते हैं?

या फिर पूरे ग्रंथ के विभिन्न पक्षों—महिला सम्मान, पारिवारिक दायित्व, पुरुषों के कर्तव्य, सामाजिक अनुशासन और महिलाओं की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध—सभी को सामने रखकर निष्पक्ष निष्कर्ष निकालेंगे?

इतिहास का ईमानदार अध्ययन चयनित उद्धरणों से नहीं, पूरे संदर्भ से होता है।

निष्कर्ष: मनु की कसौटी नहीं, संविधान की कसौटी

मनुस्मृति में महिलाओं के लिए ऐसे प्रावधान हैं, जिनकी आधुनिक समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आधार पर आलोचना की जा सकती है। यह तथ्य छिपाने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि मनुस्मृति पुरुषों को भी कर्तव्यों, अनुशासन और सामाजिक मर्यादाओं से मुक्त नहीं करती।

इसलिए यह कहना कि “मनुस्मृति में केवल महिलाओं को नियंत्रित किया गया था” अधूरा निष्कर्ष होगा।

और यह कहना कि “पुरुषों पर भी कर्तव्य थे, इसलिए महिलाओं की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध उचित थे” भी तार्किक रूप से सही नहीं होगा।

दोनों तथ्यों को साथ रखकर ही संतुलित निष्कर्ष निकलेगा।

मनुस्मृति में स्त्री के सम्मान की भाषा भी है और उसकी स्वतंत्रता को सीमित करने वाली व्यवस्था भी। पुरुष के लिए अधिकारों के साथ कठोर सामाजिक दायित्व भी हैं।

आज का भारत इन प्राचीन व्यवस्थाओं से आगे बढ़कर संविधान के आधार पर चलता है। इसलिए वर्तमान भारत में निर्णायक सवाल यह नहीं है कि मनु ने क्या कहा था, बल्कि यह है कि संविधान आज महिला और पुरुष दोनों को क्या अधिकार देता है।

यही दृष्टिकोण राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर इतिहास, समाज और आधुनिक भारत को समझने का रास्ता दिखाता है।

— अवनीश त्यागी
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