‘अब इंसेंटिव नहीं, पूरा वेतन चाहिए’… 10 लाख आशा कर्मियों ने खोला मोर्चा, PM को भेजीं 17 बड़ी मांगें, सरकार पर बढ़ा दबाव
बिजनौर में आशा/आशा संगिनी कर्मचारी संगठन ने प्रधानमंत्री के नाम 17 सूत्रीय मांगपत्र भेजकर ₹18 हजार से ₹36 हजार वेतन, पेंशन, EPF-ESI, नियमितीकरण और सामाजिक सुरक्षा की मांग उठाई। पढ़िए पूरी रिपोर्ट।
‘गांव-गांव स्वास्थ्य सेवा हमारी, फिर भी वेतन से क्यों वंचित?’ आशा कर्मियों का सरकार से सीधा सवाल, प्रधानमंत्री तक पहुंची 17 सूत्रीय मांगें
TargetTvLive | विशेष रिपोर्ट
रिपोर्ट: अवनीश त्यागी
बिजनौर। देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे मजबूत और जमीनी चेहरा मानी जाने वाली आशा और आशा संगिनी कर्मियों ने अब अपने अधिकारों के लिए निर्णायक आवाज बुलंद कर दी है। वर्षों से गांव-गांव जाकर गर्भवती महिलाओं की देखभाल, बच्चों का टीकाकरण, परिवार नियोजन, पोषण, संक्रामक रोगों की रोकथाम और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाने वाली इन महिलाओं का कहना है कि जिम्मेदारियां सरकारी कर्मचारी जैसी हैं, लेकिन सुविधाएं आज भी सम्मानजनक नहीं हैं।
इसी मुद्दे को लेकर आशा/आशा संगिनी कर्मचारी संगठन (भारतीय मजदूर संघ संबद्ध) ने बिजनौर में जिलाधिकारी के माध्यम से प्रधानमंत्री, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को 17 सूत्रीय मांगपत्र भेजकर स्पष्ट संदेश दिया है कि अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस निर्णय चाहिए।
सरकार की योजनाओं का आधार बनीं आशा बहनें, लेकिन खुद सुविधाओं से दूर
देश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत करीब 10 लाख से अधिक आशा कार्यकर्ता काम कर रही हैं। गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहली कड़ी यही महिलाएं हैं। प्रसव से लेकर टीकाकरण, नवजात शिशु की देखभाल, पोषण अभियान, स्वच्छता, परिवार नियोजन और बीमार मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने जैसे लगभग हर महत्वपूर्ण काम में इनकी भूमिका रहती है।
इसके बावजूद संगठन का आरोप है कि आज भी अधिकांश आशा कर्मियों को नियमित वेतन नहीं मिलता, बल्कि अलग-अलग कार्यों के आधार पर मिलने वाले इंसेंटिव से ही काम चलाना पड़ता है।
2025 में भी सौंपा था ज्ञापन, फिर क्यों नहीं हुई कार्रवाई?
ज्ञापन में बताया गया है कि अक्टूबर 2025 में भी देशभर के जिला मुख्यालयों पर धरना-प्रदर्शन कर मांगपत्र सौंपे गए थे। लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद भी मांगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसी वजह से 9 जुलाई 2026 को एक बार फिर प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन भेजकर जल्द निर्णय लेने की मांग की गई है।
आशा कर्मियों की सबसे बड़ी मांग—’इंसेंटिव नहीं, नियमित वेतन चाहिए’
संगठन का कहना है कि यदि एक सरकारी कर्मचारी की तरह जिम्मेदारी निभाई जा रही है तो भुगतान भी उसी स्तर का होना चाहिए। मांगपत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि प्रोत्साहन राशि (इंसेंटिव) की व्यवस्था खत्म कर नियमित वेतन लागू किया जाए।
17 सूत्रीय मांगों में क्या-क्या शामिल है?
संगठन ने सरकार के सामने कई महत्वपूर्ण मांगें रखी हैं—
✔ ₹18,000 से ₹36,000 तक मासिक वेतन
✔ समान कार्य के लिए समान वेतन
✔ नियमितीकरण और पदोन्नति व्यवस्था
✔ वार्षिक वेतन वृद्धि
✔ राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में संविलियन
✔ EPF और ESI की सुविधा
✔ सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन
✔ ₹10 लाख रिटायरमेंट बेनिफिट
✔ ड्यूटी के दौरान मृत्यु पर ₹5 लाख मुआवजा
✔ यात्रा भत्ता (TA/DA)
✔ वर्ष में दो बार यूनिफॉर्म
✔ अस्पतालों में विश्राम कक्ष
✔ टीकाकरण भत्ते में बढ़ोतरी
✔ प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन योजना की आयु सीमा 40 से बढ़ाकर 60 वर्ष करना
2018 की घोषणा का भी दिलाया याद
मांगपत्र में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री ने आशा कर्मियों के इंसेंटिव को दोगुना करने की घोषणा की थी, लेकिन संगठन का आरोप है कि इसका लाभ सीमित कार्यों तक ही पहुंचा। अधिकांश कार्यों का भुगतान आज भी पुराने मानकों पर ही हो रहा है।
विश्लेषण: सरकार के लिए आसान नहीं होगा यह फैसला
आशा कर्मियों की मांगें केवल वेतन बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं। यदि सरकार इन्हें नियमित कर्मचारी का दर्जा देती है या वेतन व्यवस्था लागू करती है, तो इससे सरकारी खजाने पर बड़ा वित्तीय भार पड़ सकता है। दूसरी ओर, आशा कर्मियों का तर्क है कि वर्षों से स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ बनने के बावजूद उन्हें न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा तक उपलब्ध नहीं है।
यानी सरकार के सामने एक ओर वित्तीय चुनौती है तो दूसरी ओर लाखों महिला स्वास्थ्य कर्मियों की अपेक्षाएं।
सबसे बड़ा सवाल
देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे मजबूत आधार बनने वाली आशा कर्मियों को क्या अब भी केवल इंसेंटिव पर काम करना होगा?
क्या सरकार उन्हें नियमित वेतन, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार देगी?
क्या इस बार 17 सूत्रीय मांगपत्र पर कोई ठोस फैसला होगा या फिर यह मांग भी फाइलों में दबकर रह जाएगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में केंद्र और राज्य सरकार की कार्रवाई तय करेगी।
TargetTvLive Analysis
आशा कर्मियों की मांगों को केवल वेतन विवाद मानना उचित नहीं होगा। यह मुद्दा ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था, महिला श्रम, सामाजिक सुरक्षा और सरकारी योजनाओं की सफलता से जुड़ा हुआ है। यदि सरकार इन मांगों पर सकारात्मक कदम उठाती है तो इसका लाभ सीधे देश की स्वास्थ्य सेवाओं को मिलेगा। वहीं यदि मांगें लंबे समय तक अनसुनी रहीं तो यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर और बड़ा रूप ले सकता है।
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