AI के एल्गोरिदम तय करेंगे न्याय? ब्राजील वर्ल्ड कांग्रेस में डॉ. विवेक त्यागी ने पेश किया ‘Nomos 5.0’ का चौंकाने वाला विज़न
ग्लोबल साउथ के लिए चेतावनी—तकनीक अगर नियंत्रित नहीं हुई तो बढ़ सकती है न्याय की खाई
मेरठ/ब्राजील | स्पेशल इन-डेप्थ रिपोर्ट
तेजी से बदलती दुनिया में जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हर क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है, वहीं अब यह न्याय व्यवस्था के मूल ढांचे को भी पुनर्परिभाषित करने की दिशा में बढ़ रहा है। ब्राजील में आयोजित अंतरराष्ट्रीय वर्ल्ड कांग्रेस में विधि अध्ययन संस्थान, मेरठ के समन्वयक डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने अपने विचारों से इस जटिल बदलाव को न केवल स्पष्ट किया, बल्कि इसके दूरगामी प्रभावों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
उनका विषय—“Nomos 5.0: Artificial Intelligence, Equity & Hermeneutics of Justice in the Global South”—आज के समय में न्याय और तकनीक के बीच बढ़ते टकराव और तालमेल, दोनों को समझने का एक मजबूत बौद्धिक आधार बनकर सामने आया।
‘Nomos’ क्या है? सिर्फ कानून नहीं, पूरी व्यवस्था का ढांचा
डॉ. त्यागी ने अपने संबोधन की शुरुआत ‘नोमोस’ की गहराई को समझाते हुए की। उन्होंने बताया कि यह केवल कानूनों या नियमों का समूह नहीं, बल्कि वह व्यापक ढांचा है जो तय करता है कि—
- समाज कैसे संचालित होगा
- सत्ता किसके हाथ में होगी
- और न्याय की परिभाषा क्या होगी
उन्होंने जर्मन विधि-चिंतक Carl Schmitt और फ्रांसीसी दार्शनिक Claude Lefort के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि ‘नोमोस’ स्थिर नहीं होता, बल्कि समय, राजनीति और समाज के साथ बदलता रहता है।
Nomos 1.0 से 5.0 तक: न्याय का बदलता चेहरा
डॉ. त्यागी ने ‘नोमोस’ की विकास यात्रा को पांच चरणों में समझाया, जो आधुनिक न्याय व्यवस्था के विकास को दर्शाती है:
1. Nomos 1.0: शक्ति और सीमाओं का युग
इस चरण में न्याय पूरी तरह सत्ता और भू-राजनीतिक सीमाओं पर आधारित था।
2. Nomos 2.0 और 3.0: औद्योगिक और राष्ट्र-राज्य का दौर
औद्योगिक क्रांति और आधुनिक राष्ट्र-राज्य के उभार ने न्याय को संस्थागत रूप दिया।
3. Nomos 4.0: वैश्वीकरण और डिजिटल हस्तक्षेप
इस दौर में तकनीक और वैश्विक संपर्क ने न्याय को सीमाओं से परे पहुंचाया।
4. Nomos 5.0: AI और डेटा-आधारित न्याय प्रणाली
वर्तमान चरण, जहां एल्गोरिदम, मशीन लर्निंग और डेटा एनालिटिक्स न्यायिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर रहे हैं।
अब अदालत नहीं, एल्गोरिदम भी देंगे फैसले?
डॉ. त्यागी ने स्पष्ट किया कि आज न्याय केवल जज और अदालत तक सीमित नहीं रह गया है। अब—
- डिजिटल प्लेटफॉर्म्स
- AI आधारित सिस्टम
- डेटा एल्गोरिदम
भी निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बन चुके हैं।
उन्होंने कहा, “AI न्याय को तेज, सुलभ और किफायती बना सकता है, लेकिन अगर इसमें पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं हुई, तो यह खतरनाक भी साबित हो सकता है।”
AI के खतरे: अदृश्य पक्षपात और जवाबदेही का संकट
डॉ. त्यागी ने AI आधारित न्याय प्रणाली से जुड़े तीन बड़े जोखिमों की ओर ध्यान आकर्षित किया:
- एल्गोरिदमिक बायस: डेटा में छिपा पूर्वाग्रह फैसलों को प्रभावित कर सकता है
- पारदर्शिता की कमी: AI के निर्णय कैसे लिए जा रहे हैं, यह स्पष्ट नहीं होता
- जवाबदेही का अभाव: गलत निर्णय के लिए जिम्मेदार कौन होगा?
उन्होंने चेताया कि बिना नियमन के AI न्याय को निष्पक्ष बनाने के बजाय असमानताओं को और गहरा कर सकता है।
ग्लोबल साउथ: जहां सबसे ज्यादा असर पड़ेगा
भारत समेत ग्लोबल साउथ के देशों के संदर्भ में डॉ. त्यागी ने कहा कि यहां की परिस्थितियां अलग और चुनौतीपूर्ण हैं:
- आर्थिक असमानता
- तकनीकी संसाधनों की कमी
- डिजिटल डिवाइड
इन परिस्थितियों में AI का असंतुलित उपयोग न्याय तक समान पहुंच को और मुश्किल बना सकता है।
‘Equity’ ही समाधान: समान नहीं, न्यायसंगत विकास जरूरी
डॉ. त्यागी ने जोर देकर कहा कि केवल ‘Equality’ (समानता) पर्याप्त नहीं है, बल्कि ‘Equity’ (न्यायसंगतता) जरूरी है।
मतलब—हर व्यक्ति को उसकी जरूरत और परिस्थिति के अनुसार न्याय मिलना चाहिए, तभी तकनीकी विकास वास्तव में समावेशी बन पाएगा।
Hermeneutics of Justice: कानून से आगे की सोच
अपने संबोधन के एक अहम हिस्से में उन्होंने ‘हर्मेन्यूटिक्स ऑफ जस्टिस’ की अवधारणा को रखा।
उन्होंने कहा कि न्याय को समझने और लागू करने के लिए जरूरी है कि हम—
- सामाजिक वास्तविकताओं
- सांस्कृतिक विविधताओं
- और मानवीय संवेदनाओं
को ध्यान में रखें, न कि केवल कानून की किताबों को।
क्या करना होगा आगे? डॉ. त्यागी का ग्लोबल रोडमैप
डॉ. त्यागी ने भविष्य के लिए एक स्पष्ट रोडमैप भी प्रस्तुत किया:
- AI के लिए सख्त नियामक ढांचा
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग
- बहु-विषयक शोध (Law + Technology + Sociology)
- नीति निर्माण में पारदर्शिता
उन्होंने कहा कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो AI न्याय को लोकतांत्रिक बनाने के बजाय केंद्रीकृत और असमान बना सकता है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की मजबूत उपस्थिति
इस वर्ल्ड कांग्रेस में प्रो. एलिना-रूस, प्रो. रोडिरीगो बोल्विया, प्रो. एना एलिस, प्रो. जार्ज इशाक और प्रो. डेलिन्टन जैसे अंतरराष्ट्रीय विद्वानों ने भाग लिया।
डॉ. विवेक त्यागी का यह संबोधन न केवल चर्चा का केंद्र बना, बल्कि इसे भविष्य की न्याय प्रणाली के लिए एक विचारशील ब्लूप्रिंट के रूप में भी देखा जा रहा है।
निष्कर्ष: न्याय का भविष्य—कोड, डेटा और मानवीय संवेदना का संतुलन
डॉ. त्यागी का ‘Nomos 5.0’ सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि आने वाले समय में न्याय केवल कोर्टरूम में नहीं, बल्कि कोड और एल्गोरिदम में भी लिखा जाएगा।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या यह न्याय सभी के लिए समान और निष्पक्ष होगा, या फिर तकनीक नई असमानताओं को जन्म देगी?
यही वह चुनौती है, जिस पर आज दुनिया को गंभीरता से विचार करना होगा।












