छुट्टियां कागजों में, शिक्षक मैदान में! जनगणना से पुलिस भर्ती तक ड्यूटी का पहाड़, शिक्षक संघ बोला- “क्या हम इंसान नहीं मशीन हैं?”
ग्रीष्मावकाश में भी नहीं मिल रहा आराम, शिक्षकों का फूटा गुस्सा; अर्जित अवकाश और राहत की उठी मांग
रिपोर्ट: अवनीश त्यागी | TargetTvLive
मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश के लाखों माध्यमिक शिक्षक इन दिनों एक ऐसे सवाल से जूझ रहे हैं, जिसका जवाब शायद शिक्षा विभाग के पास भी नहीं है। जब ग्रीष्मावकाश घोषित हो चुका है, स्कूल बंद हैं और बच्चों की छुट्टियां चल रही हैं, तब आखिर शिक्षक किस बात की छुट्टी मना रहे हैं?
हकीकत यह है कि प्रदेश के हजारों शिक्षक इन दिनों जनगणना, टीजीटी भर्ती परीक्षा, डीएलएड परीक्षा, बीएड परीक्षा और पुलिस भर्ती परीक्षा जैसी सरकारी जिम्मेदारियों में लगातार व्यस्त हैं। छुट्टियां कैलेंडर में जरूर दिखाई दे रही हैं, लेकिन शिक्षकों के जीवन से मानो गायब हो चुकी हैं।
इसी मुद्दे को लेकर उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ ने सरकार और शिक्षा विभाग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष विमलेंद्र विमल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अब हालात ऐसे हो गए हैं कि शिक्षक कर्मचारी नहीं बल्कि मशीन बनकर रह गए हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या शिक्षक भी इंसान नहीं हैं? क्या उन्हें परिवार के साथ समय बिताने, स्वास्थ्य का ध्यान रखने और मानसिक रूप से तरोताजा होने का अधिकार नहीं है?
ग्रीष्मावकाश घोषित, लेकिन छुट्टी का एक दिन भी नहीं
माध्यमिक शिक्षा विभाग ने 21 मई से 30 जून तक ग्रीष्मावकाश घोषित किया है। सामान्य रूप से यह समय शिक्षकों के लिए आराम, पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन और नए शैक्षणिक सत्र की तैयारी का माना जाता है।
लेकिन इस बार स्थिति बिल्कुल अलग है।
22 मई से 20 जून तक शिक्षकों को जनगणना कार्य में लगा दिया गया है। इसके बाद भर्ती परीक्षाओं और अन्य सरकारी कार्यक्रमों में उनकी ड्यूटी तय कर दी गई है। कई जिलों में शिक्षकों को मुख्यालय छोड़ने और बाहर जाने तक की अनुमति नहीं दी जा रही।
ऐसे में शिक्षक पूछ रहे हैं कि जब पूरा अवकाश सरकारी कामों में ही निकल जाना है, तो फिर ग्रीष्मावकाश की घोषणा केवल औपचारिकता बनकर क्यों रह गई है?
एक खत्म नहीं होती, दूसरी ड्यूटी आ जाती है
शिक्षकों की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह लगातार बढ़ता कार्यभार है।
3 और 4 जून को प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (टीजीटी) भर्ती परीक्षा है।
8, 9 और 10 जून को पुलिस भर्ती परीक्षा आयोजित होनी है।
इसके अलावा डीएलएड और बीएड परीक्षाओं में भी शिक्षकों की ड्यूटी लगाई जा रही है।
यानी एक जिम्मेदारी खत्म होने से पहले दूसरी जिम्मेदारी सामने खड़ी हो जाती है।
शिक्षकों का कहना है कि उन्हें शिक्षा से जुड़े कार्यों के अलावा लगभग हर बड़े सरकारी कार्यक्रम में लगाया जाता है। चुनाव हों, जनगणना हो, सर्वेक्षण हो या भर्ती परीक्षा—हर जगह सबसे पहले शिक्षक ही याद आते हैं।
मानसिक तनाव की ओर बढ़ रहे शिक्षक
शिक्षक संघ का कहना है कि लगातार बढ़ता दबाव अब मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने लगा है।
शिक्षकों को न तो पर्याप्त विश्राम मिल पा रहा है और न ही परिवार के साथ समय बिताने का अवसर।
विमलेंद्र विमल ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि यही स्थिति बनी रही तो बड़ी संख्या में शिक्षक मानसिक तनाव और अवसाद जैसी समस्याओं का सामना कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले शिक्षक स्वयं ही थकान, तनाव और असंतोष से घिर जाएंगे तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा पर भी पड़ेगा।
नियम भी शिक्षकों के पक्ष में, फिर राहत क्यों नहीं?
शिक्षक संघ ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से नियमों और अधिनियमों का हवाला दिया है।
संघ का कहना है कि यदि किसी शिक्षक को सरकारी कार्यों के कारण घोषित अवकाश का लाभ नहीं मिल पाता है, तो उसे नियमानुसार अर्जित अवकाश (Earned Leave) दिया जाना चाहिए।
पूर्व में बोर्ड परीक्षा मूल्यांकन, प्रशिक्षण, जनगणना और अन्य विशेष सरकारी कार्यों के बदले शिक्षकों को अर्जित अवकाश का लाभ दिया जाता रहा है।
ऐसे में इस वर्ष भी वही व्यवस्था लागू की जानी चाहिए ताकि शिक्षकों को उनके अधिकारों से वंचित न किया जाए।
शिक्षक संघ की प्रमुख मांगें
– ग्रीष्मावकाश में लिए गए कार्यों के बदले अर्जित अवकाश दिया जाए।
– शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का अत्यधिक बोझ कम किया जाए।
– अवकाश अवधि में ड्यूटी लगाने से पहले स्पष्ट नीति बनाई जाए।
– शिक्षकों को मुख्यालय छोड़ने पर लगाए गए प्रतिबंधों की समीक्षा की जाए।
– शिक्षा कार्य को प्राथमिकता देते हुए शिक्षकों का सम्मान और अधिकार सुरक्षित किए जाएं।
बड़ा सवाल: क्या हर सरकारी काम का बोझ सिर्फ शिक्षकों पर ही क्यों?
यह विवाद केवल छुट्टियों का नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं का भी है।
जब भी कोई बड़ा सरकारी अभियान आता है, सबसे पहले शिक्षकों की ड्यूटी लगा दी जाती है। इससे स्कूलों की शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं और शिक्षकों का मूल दायित्व पीछे छूट जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिक्षकों को लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जाता रहेगा, तो शिक्षा की गुणवत्ता पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
सरकार को यह तय करना होगा कि शिक्षक शिक्षा देंगे या हर विभाग की अतिरिक्त जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे।
TargetTvLive विश्लेषण
उत्तर प्रदेश के शिक्षकों की नाराजगी केवल अवकाश को लेकर नहीं है। यह सम्मान, कार्य-जीवन संतुलन और सेवा नियमों के पालन का मुद्दा बन चुका है।
यदि ग्रीष्मावकाश के दौरान भी शिक्षक लगातार सरकारी कार्यों में लगे रहेंगे तो “छुट्टी” शब्द केवल सरकारी कैलेंडर तक सीमित होकर रह जाएगा।
अब निगाहें शिक्षा विभाग पर हैं। क्या शिक्षकों की मांग सुनकर उन्हें नियमानुसार अर्जित अवकाश मिलेगा या फिर एक बार फिर सरकारी मशीनरी के सबसे भरोसेमंद पहिए—शिक्षक—चुपचाप अतिरिक्त बोझ उठाने को मजबूर होंगे?
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