EXCLUSIVE:
‘कक्षा-11 का रिकॉर्ड, कक्षा-12 का सर्टिफिकेट और सरकारी नौकरी’ विवाद में नया मोड़
BSA बोले- ‘मामले में कोई सच्चाई नहीं लगती’, लेकिन जांच का ब्योरा मांगते ही साधी चुप्पी
बिजनौर के शिक्षा विभाग में चर्चाओं का केंद्र बना मामला, शिकायतकर्ता ने उठाए गंभीर सवाल, अब निष्पक्ष जांच की मांग तेज
हाइलाइट्स
- मृतक आश्रित नियुक्ति और शैक्षिक प्रमाण-पत्रों को लेकर उच्चस्तरीय शिकायत।
- विद्यालयीय रिकॉर्ड और कक्षा-12 प्रमाण-पत्र के बीच कथित विरोधाभास का दावा।
- मानव सम्पदा पोर्टल पर दर्ज विवरणों को लेकर भी उठे सवाल।
- BSA सचिन कसाना ने कहा- “मामले में कोई सच्चाई नहीं लगती।”
- पूर्व जांचों का विवरण पूछे जाने पर नहीं दे सके स्पष्ट जवाब।
- बाद में अलग से बात करने का दिया सुझाव।
- शिकायतकर्ता ने निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग दोहराई।
रिपोर्ट: अवनीश त्यागी | TargetTvLive
बिजनौर। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय से जुड़े एक परिषदीय लिपिक की नियुक्ति, शैक्षिक प्रमाण-पत्रों और मानव सम्पदा पोर्टल पर दर्ज अभिलेखों को लेकर उठे विवाद में अब नया मोड़ आ गया है। एक ओर शिकायतकर्ता लगातार दस्तावेजों के आधार पर गंभीर सवाल उठा रहा है, वहीं दूसरी ओर विभागीय स्तर पर मामले को पहले से जांचा जा चुका बताकर खारिज करने की कोशिश भी दिखाई दे रही है।
हालांकि जब जांच से जुड़े बुनियादी सवाल पूछे गए तो स्थिति उतनी स्पष्ट नजर नहीं आई, जितनी पहली नजर में दिखाई जा रही थी।
क्या है पूरा मामला?
शिकायतकर्ता द्वारा मुख्यमंत्री, बेसिक शिक्षा मंत्री, शिक्षा निदेशक, जिलाधिकारी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय से जुड़े एक परिषदीय लिपिक की मृतक आश्रित नियुक्ति के आधार बने शैक्षिक अभिलेखों में गंभीर विसंगतियां हैं।
शिकायत के अनुसार विद्यालयीय रिकॉर्ड यह दर्शाते हैं कि संबंधित व्यक्ति शैक्षिक सत्र 1994-95 में कक्षा-11 में अध्ययनरत था, जबकि दूसरी ओर उसी अवधि में कक्षा-12 उत्तीर्ण होने का प्रमाण-पत्र और अंकतालिका प्रस्तुत किए जाने का दावा किया गया है।
यही विरोधाभास पूरे मामले का केंद्र बना हुआ है।
रिकॉर्ड बनाम प्रमाण-पत्र: आखिर सच क्या है?
शिकायत में संलग्न दस्तावेजों के अनुसार संबंधित व्यक्ति का नाम वर्ष 1994-95 में कक्षा-11 के छात्र के रूप में विद्यालय अभिलेखों में दर्ज था।
विद्यालय की प्रवेश पंजिका और टीसी रिकॉर्ड का भी हवाला दिया गया है।
दूसरी ओर मानव सम्पदा पोर्टल पर अपलोड किए गए दस्तावेजों में कक्षा-12 उत्तीर्ण होने का उल्लेख बताया गया है।
यही वह बिंदु है जिसने पूरे मामले को विवादास्पद बना दिया है।
जब TargetTvLive ने BSA सचिन कसाना से पूछा सवाल…
मामले की सच्चाई जानने के लिए TargetTvLive ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी सचिन कसाना से संपर्क किया।
बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि—
“इस मामले में कोई सच्चाई नहीं लगती है। इससे पहले भी इस संबंध में कई शिकायतें की जा चुकी हैं, लेकिन जांच में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया है जिससे आरोपों की पुष्टि होती हो।”
पहली नजर में यह बयान विभागीय स्थिति को स्पष्ट करता हुआ दिखाई देता है।
लेकिन बातचीत यहीं समाप्त नहीं हुई।
पूरक सवाल पर बदल गया माहौल
जब TargetTvLive की ओर से पूरक प्रश्न करते हुए यह जानना चाहा गया कि—
- इस मामले में अब तक किन-किन अधिकारियों द्वारा जांच की गई?
- जांच कब-कब हुई?
- जांच रिपोर्ट किस अधिकारी ने प्रस्तुत की?
- शिकायतों का निस्तारण किस आधार पर किया गया?
तो इन सवालों का कोई स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब सामने नहीं आ सका।
सूत्रों के अनुसार, जांच का विवरण उपलब्ध कराने के सवाल पर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी और बातचीत को आगे बढ़ाने के बजाय चुप्पी साध ली।
इसके बाद उन्होंने इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा के बजाय अलग से एकांत में बातचीत करने की बात कही।
यहीं से उठ रहे हैं नए सवाल
यदि विभाग का दावा है कि मामले की जांच पहले ही हो चुकी है और आरोप निराधार पाए गए हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा की जाती है कि—
✔ जांच अधिकारी का नाम बताया जाए।
✔ जांच की तिथि बताई जाए।
✔ जांच रिपोर्ट का निष्कर्ष साझा किया जाए।
✔ शिकायतों के निस्तारण का आधार स्पष्ट किया जाए।
लेकिन जब इन सवालों पर स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया तो मामले को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
क्या केवल शिकायतें खारिज कर देना पर्याप्त है?
प्रशासनिक मामलों के जानकारों का मानना है कि किसी भी शिकायत को केवल “निराधार” कह देना पर्याप्त नहीं होता।
यदि शिकायत में दस्तावेज, विद्यालयीय रिकॉर्ड, सेवा अभिलेख और डिजिटल पोर्टल से जुड़े तथ्य प्रस्तुत किए गए हों तो उनके परीक्षण की प्रक्रिया भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होनी चाहिए।
विशेषकर तब, जब मामला सरकारी नियुक्ति और शैक्षिक प्रमाण-पत्रों से जुड़ा हो।
मानव सम्पदा पोर्टल भी जांच के केंद्र में
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि मानव सम्पदा पोर्टल पर दर्ज कुछ प्रविष्टियां वास्तविक पदस्थिति से मेल नहीं खातीं।
यदि ऐसा है तो यह केवल एक कर्मचारी का मामला नहीं बल्कि सरकारी डिजिटल रिकॉर्ड की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय बन सकता है।
यही वजह है कि शिकायतकर्ता ने पोर्टल के लॉग, एडिट हिस्ट्री और अनुमोदन रिकॉर्ड की भी जांच कराने की मांग की है।
अब असली सवाल जांच की पारदर्शिता का
मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अब यह नहीं रह गया है कि शिकायत सही है या गलत।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि—
यदि जांच हो चुकी है, तो उसकी रिपोर्ट कहां है?
जांच किसने की?
कब की?
और उसका निष्कर्ष क्या था?
जब तक इन सवालों के जवाब सार्वजनिक नहीं होते, तब तक विवाद खत्म होने के बजाय और गहराता दिखाई देगा।
TargetTvLive की पड़ताल जारी
TargetTvLive इस मामले से जुड़े सभी तथ्यों की स्वतंत्र पड़ताल कर रहा है। यदि जिला प्रशासन, बेसिक शिक्षा विभाग या संबंधित कर्मचारी की ओर से कोई आधिकारिक दस्तावेज, जांच रिपोर्ट अथवा स्पष्टीकरण उपलब्ध कराया जाता है तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
फिलहाल इतना जरूर है कि शिकायतकर्ता के दस्तावेज और विभागीय दावे आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं।
और इसी के बीच एक सवाल लगातार गूंज रहा है—
“यदि सब कुछ साफ है, तो जांच का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों?”
Disclaimer
यह समाचार शिकायतकर्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों, अभिलेखों तथा जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी से हुई बातचीत पर आधारित है। समाचार में वर्णित आरोप शिकायतकर्ता के हैं। इन आरोपों की पुष्टि किसी सक्षम जांच एजेंसी द्वारा नहीं की गई है। संबंधित पक्ष का विस्तृत पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
✍️ अवनीश त्यागी
TargetTvLive | खोजी पत्रकारिता की विशेष रिपोर्ट
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