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अमरोहा में ‘जहरीला विकास’ के खिलाफ 58 दिन से जंग: दूषित पानी पर भड़के किसान, बोले— जमीन छीनी, अब जिंदगी भी खतरे में

अमरोहा में ‘जहरीला विकास’ के खिलाफ 58 दिन से जंग: दूषित पानी पर भड़के किसान, बोले— जमीन छीनी, अब जिंदगी भी खतरे में

 

अमरोहा, 16 फरवरी | डिजिटल डेस्क के लिए M.P. Singh 

उत्तर प्रदेश के अमरोहा जनपद के गजरौला औद्योगिक क्षेत्र से सटे नाईपुरा गांव में चल रहा किसानों का आंदोलन अब केवल पानी की समस्या नहीं, बल्कि अस्तित्व, स्वास्थ्य और पहचान की लड़ाई बन गया है। दूषित भूजल के खिलाफ भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के बैनर तले किसानों का धरना प्रदर्शन रविवार को 58वें दिन भी जारी रहा, लेकिन शासन-प्रशासन की चुप्पी ने ग्रामीणों के आक्रोश को और बढ़ा दिया है।

किसानों का आरोप है कि औद्योगिक विकास की कीमत गांववाले अपनी सेहत और जमीन से चुका रहे हैं, जबकि राहत और समाधान अब तक केवल कागजों में सीमित हैं।

दूषित पानी बना जहर, पीला और बदबूदार हुआ भूजल

नाईपुरा के ग्रामीणों का कहना है कि गजरौला औद्योगिक क्षेत्र में संचालित रासायनिक फैक्ट्रियों से निकलने वाला जहरीला अपशिष्ट सीधे भूजल में मिल रहा है।

  • गांव में हैंडपंप और बोरिंग से निकलने वाला पानी पीला, बदबूदार और असुरक्षित हो चुका है
  • ग्रामीणों और पशुओं में त्वचा रोग, पेट की बीमारी और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं
  • किसानों का दावा है कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है

ग्रामीणों का कहना है कि पीने का पानी अब जीवन का आधार नहीं, बल्कि बीमारी का कारण बन गया है।

“किसान दिवस, जनसुनवाई सब दिखावा”: किसानों का बड़ा आरोप

धरनास्थल पर मौजूद किसानों ने सरकार के किसान दिवस, जनसुनवाई, तहसील दिवस, जनता दर्शन और मुख्यमंत्री पोर्टल जैसे कार्यक्रमों पर सवाल उठाते हुए कहा—

“अगर ये व्यवस्थाएं प्रभावी होतीं तो हमें 58 दिन से धरना नहीं देना पड़ता।”

किसानों का आरोप है कि शिकायतें करने के बावजूद ना कोई ठोस जांच हुई और ना ही प्रदूषण रोकने के लिए कार्रवाई।

जमीन गई, रोजगार नहीं मिला— किसान बने मजदूर

भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने औद्योगिक विकास मॉडल पर गंभीर सवाल उठाए।

उन्होंने कहा:

  • कारखानों ने किसानों की जमीन खरीदकर उन्हें मजदूर बना दिया
  • अब जमीन की कीमत खेती से नहीं, बल्कि निवेश और पैसे की ताकत से तय हो रही है
  • यह केवल जमीन का नहीं, बल्कि किसानों की पहचान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यही स्थिति जारी रही तो गांव खत्म हो जाएंगे और किसान मजदूर बनकर रह जाएंगे।

प्रदेश नेतृत्व ने दी आंदोलन तेज करने की चेतावनी

भाकियू के प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान ने सरकार से तत्काल मांगें रखीं:

  • प्रदूषण फैलाने वाले रासायनिक कारखानों पर सख्त कार्रवाई
  • गांव में शुद्ध पेयजल की तत्काल व्यवस्था
  • प्रदूषण का स्थायी समाधान

उन्होंने चेतावनी दी:

“यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन को और व्यापक और उग्र बनाया जाएगा।”

“यह लड़ाई पूरे क्षेत्र की है”— एकजुट होने की अपील

अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी एवं मंडलाध्यक्ष एहसान अली ने इसे पूरे क्षेत्र का मुद्दा बताते हुए कहा कि

“यह केवल नाईपुरा गांव की समस्या नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य का सवाल है।”

उन्होंने ग्रामीणों से एकजुट रहकर संघर्ष जारी रखने की अपील की।

विश्लेषण: औद्योगिक विकास बनाम ग्रामीण अस्तित्व का टकराव

नाईपुरा का आंदोलन कई बड़े सवाल खड़े करता है:

  • क्या औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरण सुरक्षा की अनदेखी हो रही है?
  • क्या ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण के नियम प्रभावी हैं?
  • क्या किसानों को विकास का लाभ मिला या केवल नुकसान?

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ तो यह आंदोलन क्षेत्रीय से राज्य स्तर का बड़ा जनांदोलन बन सकता है।

प्रशासन की चुप्पी से बढ़ा अविश्वास

धरना शुरू हुए लगभग दो महीने होने के बावजूद प्रशासन द्वारा कोई ठोस सार्वजनिक कार्रवाई या समाधान सामने नहीं आने से ग्रामीणों का भरोसा कमजोर हुआ है।

इस आंदोलन ने यह संकेत दे दिया है कि अब ग्रामीण अपने पानी, जमीन और अस्तित्व के लिए लंबी लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।

धरनास्थल पर मौजूद प्रमुख किसान नेता

धरने में मुख्य रूप से मौजूद रहे:

  • चौधरी चरणसिंह, ओमपाल सिंह, मंसूर अली, होमपाल सिंह, ओमप्रकाश सिंह, आशाराम, पृथ्वी सिंह, गंगाराम सहित सैकड़ों किसान

नाईपुरा बना ग्रामीण संघर्ष का प्रतीक

नाईपुरा का यह आंदोलन अब केवल एक गांव का विरोध नहीं, बल्कि देश में औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय न्याय के बीच संतुलन की बहस का प्रतीक बन चुका है।

यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो यह मुद्दा आने वाले समय में राजनीतिक और सामाजिक रूप से बड़ा असर डाल सकता है।

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