बिजली के निजीकरण पर उठे सवाल, संघर्ष समिति का विरोध प्रदर्शन जारी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति का विरोध प्रदर्शन लगातार 126वें दिन जारी रहा। समिति ने पावर कॉरपोरेशन के उस दावे पर सवाल उठाए हैं, जिसमें कहा गया है कि वर्ष 2025-26 में एटी एंड सी (एग्रीगेट टेक्निकल एंड कमर्शियल) हानियां 13.82% तक घट जाएंगी। इस दावे के बावजूद पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की प्रक्रिया जारी रखना कर्मचारियों और अभियंताओं में आक्रोश का विषय बना हुआ है।
संघर्ष समिति के तर्क और सरकार का दावा
संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए कहा कि मल्टी ईयर टैरिफ डिस्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन 2005 के लागू होने के बाद पावर कॉरपोरेशन ने दावा किया है कि अगले वित्तीय वर्ष तक एटी एंड सी हानियां 13.82% तक पहुंच जाएंगी। प्रदेश के ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने भी हाल ही में ट्वीट कर बताया था कि वर्ष 2017 में यह हानियां 40% थीं, जो 2024 में घटकर 16.5% रह गई हैं।
संघर्ष समिति ने केंद्रीय विद्युत मंत्रालय के 2020 के ड्राफ्ट स्टैंडर्ड बिडिंग रेगुलेशन का हवाला देते हुए कहा कि जिन वितरण निगमों में एटी एंड सी हानियां 15% से कम हों, वहां निजीकरण की आवश्यकता नहीं होती। इस आधार पर पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण की प्रक्रिया को अनुचित बताया गया है।
औद्योगिक अशांति और कर्मचारी असंतोष
संघर्ष समिति का आरोप है कि पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन निजीकरण का मुद्दा उठाकर राज्य के ऊर्जा निगमों में चार महीनों से अनावश्यक औद्योगिक अशांति पैदा कर रहा है। समिति का मानना है कि बिजली कर्मी और अभियंता इस वित्तीय वर्ष में एटी एंड सी हानियां 15% से नीचे लाने में सक्षम हैं। ऐसे में, निजीकरण का निर्णय तत्काल वापस लेकर कर्मचारियों को अपने कार्यों में दक्षता साबित करने का मौका दिया जाना चाहिए।
राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन और आगामी रैली की तैयारी
निजीकरण के खिलाफ बिजली कर्मचारियों का विरोध प्रदर्शन प्रदेशभर में जारी है। समिति के नेतृत्व में विभिन्न कार्यालयों में जाकर कर्मचारियों और अभियंताओं से समर्थन जुटाया जा रहा है। इस सिलसिले में आगामी 09 अप्रैल को लखनऊ में एक विशाल रैली का आयोजन किया जाएगा, जिसके लिए व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में बिजली के निजीकरण को लेकर जारी यह विरोध राज्य की ऊर्जा नीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। यदि सरकार अपने वादे के अनुसार एटी एंड सी हानियों को राष्ट्रीय मानक से नीचे लाने में सफल रहती है, तो निजीकरण की आवश्यकता पर पुनर्विचार करना आवश्यक होगा। संघर्ष समिति का यह आंदोलन सरकार और बिजली कर्मियों के बीच संवाद और नीतिगत फैसलों पर गहरी छाप छोड़ सकता है।












