गजरौला बना ज़हरीली प्रयोगशाला !
सुपर-रिच की फैक्टरियों के खिलाफ किसानों का बेमियादी आंदोलन, लोकतंत्र और पर्यावरण दोनों खतरे में
बारिश, बिजली और कड़ाके की ठंड में भी डटे किसान — पानी, फसल नहीं अब सिस्टम बदलने की लड़ाई
अमरोहा | 23 जनवरी 2026 | एम पी सिंह की विशेष रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले का गजरौला औद्योगिक क्षेत्र अब केवल एक औद्योगिक हब नहीं, बल्कि ज़हरीले पानी, दूषित मिट्टी और लाइलाज बीमारियों की प्रयोगशाला बनता जा रहा है। रासायनिक कारखानों द्वारा छोड़े जा रहे जहरीले अपशिष्ट के खिलाफ किसानों का आक्रोश अब आंदोलन में तब्दील हो चुका है।
भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी के नेतृत्व में शहबाजपुर डोर गांव में एक महीने से अधिक समय से बेमियादी धरना जारी है। हैरानी की बात यह है कि बारिश, आसमान में बिजली की गर्जना और कड़ाके की ठंड के बावजूद किसान बसंत पंचमी जैसे पर्व पर भी अलाव जलाकर धरना स्थल पर डटे रहे, लेकिन प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
भूजल से ज़हर, खेतों से फसलें गायब, गांवों में कैंसर की दस्तक
धरना स्थल पर पहुंचे विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने किसानों की पीड़ा को साझा किया। मीडिया में खबरें आने के बाद अमृतसर (पंजाब) से पहुंचे डॉ. राधेश्याम, समाजवादी पार्टी (महिला प्रकोष्ठ) की प्रदेश उपाध्यक्ष कुंतेश सैनी, बीके रीता दीदी सहित अन्य वक्ताओं ने गंभीर आरोप लगाए।
वक्ताओं का कहना है कि गजरौला औद्योगिक क्षेत्र की फैक्टरियां भूजल और मिट्टी को ज़हरीला बना चुकी हैं। नाईपुरा सहित आसपास के गांवों में रहस्यमयी बीमारियां, कैंसर जैसे जानलेवा रोग, पशुओं की मौत और आम समेत कई फसलों का चक्र पूरी तरह बिगड़ चुका है।
ग्रामीण आज भी दूषित पानी पीने को मजबूर हैं, जिससे स्वास्थ्य संकट हर दिन और गहराता जा रहा है।
सुपर-रिच बनाम किसान: तीन गुना बढ़ी दौलत, उजड़ते गांव
भाकियू अध्यक्ष नरेश चौधरी ने सरकार और कॉरपोरेट गठजोड़ पर तीखा हमला बोलते हुए कहा—
“सुपर-रिच लोग राजनीतिक ताकत हासिल कर जल-जंगल-जमीन, पर्यावरण और सामाजिक सुरक्षा के नियम अपने फायदे के मुताबिक गढ़ रहे हैं।”
उन्होंने दावा किया कि पिछले पांच वर्षों में बड़े कारखानेदारों की संपत्ति तीन गुना बढ़ी, जबकि किसान और ग्रामीण प्रदूषण की मार झेलते हुए बदहाली की ओर धकेल दिए गए।
प्रभावी प्रदूषण नियंत्रण कानून, सुपर-रिच पर टैक्स और पर्यावरणीय नियमों का सख्त पालन सिर्फ कागजों तक सीमित है। यहां तक कि मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म भी कारपोरेट प्रभाव में होने के कारण आम लोगों की आवाज दबाई जा रही है।
CSR भी बना मज़ाक: गांव को नहीं मिला हक, बांटा गया ज़हर
किसानों ने आरोप लगाया कि कारखानेदारों ने CSR फंड के तहत मिलने वाला 2% लाभांश भी नियमानुसार शाहपुरा गांव पर खर्च नहीं किया।
स्थिति यह है कि एक जनसंपर्क अधिकारी की चार घंटे की कमाई, स्थानीय मजदूर की साल भर की कमाई से अधिक है, जबकि गांवों में ज़हरीला पानी और बीमारियां बांटी जा रही हैं।
चेतावनी: अब यह आंदोलन सिर्फ पानी या फसल का नहीं
भाकियू के राष्ट्रीय प्रमुख सचिव अरुण सिद्धू ने सरकार को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि यदि—
- प्रभावित लोगों की स्वास्थ्य जांच,
- न्यायसंगत मुआवजा,
- और दूषित पानी की समस्या का स्थायी समाधान
पर गंभीरता नहीं दिखाई गई, तो हालात और विस्फोटक हो सकते हैं।
आज यह धरना केवल पानी और फसल बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि
➡️ बढ़ती आर्थिक असमानता,
➡️ पर्यावरण विनाश,
➡️ और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की निर्णायक लड़ाई बन चुका है।
आंदोलन में उमड़ा किसान सैलाब
इस अवसर पर वयोवृद्ध किसान नेता चौधरी चरण सिंह, प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान, ओम प्रकाश, समरपाल सैनी, होमपाल सिंह, सुरेश सिंह, विजय सिंह, रामप्रसाद सिंह समेत सैकड़ों किसान मौजूद रहे।
गजरौला का यह आंदोलन अब सरकार और प्रशासन के लिए चेतावनी की आखिरी घंटी है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह संघर्ष आने वाले दिनों में प्रदेश-स्तरीय जनांदोलन का रूप ले सकता है।
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